चंद्रशेखर रावण से प्रियंका की भेंट के बाद बसपा की झल्लाहट कुछ कहती है...

उ.प्र. की सियासत रोज एक नये मोड़ से गुजर रही है। कांग्रेस और सपा, बसपा गठबंधन के मध्य चल रही रस्साकसी ने वैसे ही सूबे में भाजपा विरोधी पक्ष की ताकत को शिथिल कर रखा था कि कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी और भीम आर्मी चीफ चंद्रशेखर रावण के मध्य अस्पताल में हुई मुलाकात से मायावती समेत उ.प्र. की समूची सियासत में एक उबाल आ गया? आखिर क्यों आया यह उबाल, जब भीम आर्मी की कोई राजनीतिक हैसियत ही नहीं है? क्यों चंद्रशेखर रावण से प्रियंका की भेंट, बसपा प्रमुख मायावती और सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव को करीब डेढ़ घंटे की बैठक करने को विवश कर देती है। बताया जाता है कि मायावती के आवास पर हुई बैठक में प्रियंका-चंद्रशेखर की मुलाकात का जवाब देने की रणनीति पर विचार किया गया। लेकिन सवाल है कि कैसा जवाब और वह भी क्यों ? आखिर मायावाती की नौसिखिये चंद्रशेखर रावण से परेशानी का सबब क्या हो सकता है। जबकि मायावती ने खुद अनेक बार भीम आर्मी की दलितों के मध्य पैठ को सिरे से खारिज किया है। दरअसल बसपा सुप्रीमों मायावती, भीम आर्मी के बढ़ते प्रभाव के कारण असुरक्षाबोध से घिरी हुई हैं। पूर्व में भी अनेक दफे रावण ने मायावती को बुआ कह कर संबोधित किया था तब भी उन्होनें इतनी ही तीखी और त्वरित प्रतिक्रिया दी थी। चूंकि मायावती उ.प्र. में दलितों की एक मात्र प्रबल नेता की अपनी छवि में किसी भी प्रकार का सवाल बर्दाश्त नहीं कर सकती हैं अतः समय-समय पर उन्होने बसपा के ही अनेक उभरते हुये नेताओं के करियर को सप्रयास समाप्त और सीमित किया है। कांशीराम के समय से जुड़े अनेक कार्यकर्ताओं ने दबे तो कभी मुखर स्वरों में इस बात का विरोध भी किया है किंतु वह विरोध नक्कारखाने में तूती की आवाज के मानिंद गुम हो गया। और मायावती की छवि पर कोई आंच नहीं आ पायी। यह पहली बार हो रहा है कि किसी उभरते हुये युवा दलित नेता का तीखापन, मायावती के कसैलेपन को विचिलित कर रहा है। मामले की गंभीरता ऐसे मापी जा रही है कि अगर कांग्रेस चुनावों में चंद्रशेखर को साथ लेती है, तो सपा-बसपा अमेठी और रायबरेली में उम्मीदवार उतार कर कांग्रेस पर दवाब बनाएंगे। दरअसल, गठबंधन के तहत सपा और बसपा ने राहुल गांधी और सोनिया गांधी की सीट अमेठी व रायबरेली पर उम्मीदवार उतारने का फैसला नहीं लिया है, लेकिन पल-पल बदलते समीकरण को देखते हुए एक दूसरे पर दबाव बनाने की कोशिश जारी है, जिसके बाद कहा जा रहा है कि गठबंधन इन दोनों सीटों पर भी उम्मीदवार उतार सकता है। हालांकि रावण ने प्रियंका से अपनी मुलाकात को कांग्रेस से जुड़ने का क्रम मानने से इंकार किया है लेकिन महागठबंधन से प्रधानमंत्री मोदी के विरूद्ध सशक्त प्रत्याशी उतारने की अपील की है। चंद्रशेखर ने कहा कि यदि प्रत्याशी सशक्त नहीं हुआ तो वह स्वयं मैदान में उतरेंगे। यहीं पर कांग्रेस नेत्री प्रियंका गांधी यह कहना कि मैं इस लड़के के संघर्ष को समझती हूं, अनेक संभावनाओं को प्रकट करता है। एक तरफ मायावती हैं, जो भीम आर्मी किसी भी प्रकार का रिश्ता नहीं रखना चाहतीं दूसरी तरफ कांग्रेस है जिसकी स्टारनेत्री उसके संघर्ष को समझने का दावा करती है। और यह भी कहती हैं कि इसीलिये उसे सपोर्ट करने आयी हैं। यह सपोर्ट किसी बड़ी संभावना की ओर संकेत दे रहा है।  आपको याद होगा हाल ही में सम्पन्न हुये गुजरात विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने अपने सशक्त उम्मीदावार को वापस लेकर अनुसूचित जाति के नेता जिग्नेश मेवाणी का समथर्न किया था, हार्दिक पटेल भी अब कांग्रेस का परचम थामे हैं, अल्पेश ठाकोर भी कांग्रेस में हैं यदि तो इन उदाहरणों को सामने रखा जाये तो चंद्रशेखर रावण भी वाराणसी में कांग्रेस के प्रत्याशी हो सकते हैं! दीगर है कि चंद्रशेखर रावण के स्वर भाजपा विरोध में मुखर रहे हैं। भाजपा को समाप्त करने, उसकी सरकार को उखाड़ फेंकने जैसे बयान सैकड़ों बार उन्होने दिये हैं जबकि मायावती उन्हें भाजपा की बी टीम करार देती हैं। शायद यही वह टीस है जिसने भीम आर्मी चीफ को मुंह से यह कहलवा दिया कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दलितों की तादाद ज्यादा है। आदरणीय कांशीराम और मायावती दोनों सहारनपुर से चुनाव लड़ चुके हैं। यह इलाका कभी बसपा का गढ़ माना जाता था। लेकिन अब यहां भीम आर्मी का प्रभाव है। इससे बीएसपी भी डरी हुई है। मतलब चंद्रशेखर भी बसपा के डर को भांप चुके हैं। वह कैराना और नूरपुर के उप चुनाव में भाजपा की हार को अपने प्रभाव से जोड़ते हुये कहते हैं यहां बीजेपी की करारी हार की पटकथा दलित वोटरों ने ही लिखी थी। यूपी में करीब 21 फीसदी आबादी दलितों की है। प्रदेश में लोकसभा की कुल 80 सीटों में अनुसूचित जाति के लिए 17 सीटें आरक्षित हैं। इन सभी सीटों पर हमारा प्रत्यक्ष रूप से प्रभाव बन गया है। इन सीटों से बीजेपी की बेदखली ही उनका समीकरण बिगाड़ने जैसा होगा। और हां! अगर दलितों के अलावा सूबे की 19 फीसदी मुस्लिम आबादी भी कमर कस ले, तो बीजेपी देश से भी बेदखल हो जाएगी।यहां पर एक छिपे तथ्य को समझने की आवश्यकता है कि भाजपा की ताकत हिंदुत्व के मुद्दों में बसती है। ये वह मुद्दे होते हैं जो जाति की बेड़ियों को तोड़ कर समाज को संगठित हिंदू का आकार प्रदान करते हैं। गुजरात के विधान सभा चुनाव में हिंदुत्व की इस मुठ्ठी को जातियों के शक्ल में खोलने में काफी हद तक सफल रही थी कांग्रेस और भाजपा लगभग हारते हुये जीत पायी थी। शायद चंद्रशेखर रावण के माध्यम से उत्तर प्रदेश में भी कांग्रेस कुछ ऐसा करना चाहती है। रावण के माध्यम से दलित मतों में सेंध लगा कर एक तरफ मायावती को सबक सिखाने की मंशा है तो दूसरी तरफ सूबे में अभी तक कायम अपनी दयनीय स्थिति को सशक्त करने की चाहत है। सूबे में अल्पसंख्यक मतों का खासा वोट कांग्रेस की तरफ रूझान रखता है किंतु अभी भी वह भाजपा से लड़ने की स्थिति में गठबंधन को अधिक सक्षम पाता है अतः उसका झुकाव कांग्रेस की बनिस्पत गठबंधन प्रत्याशी की तरफ अधिक है। यदि चंद्रशेखर रावण का साथ कांग्रेस को मिल जाता है तो नई सृजित होती संभावनाओं के क्रम में मुस्लिम मतों का झुकाव भी कांग्रेस की तरफ बढ़ सकता है जोकि गठबंधन के लिये चिंता का सबब बनेगा लेकिन कांग्रेस को यूपी में प्राण वायु प्रदान करेगा। वैसे यह भाजपा के लिये राहत बख्शने वाली स्थिति होगी।

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