भक्ति का मार्ग, श्रद्धा की डोर और आस्था का रेला

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ये भक्ति का मार्ग है और इस मार्ग पर सब कठिनाइयों को पार करने में सहारा बन रहा है बाबा श्यामधणी का नाम. हाथ में बाबा के निशान लिए श्रद्धा की डोर थामे हुए बाबा के धाम की ओर बढ़ते कदम बस मंजिल तक पहुंचने की चाह में उतावले हैं. इसमें 87 साल के मांगीलाल भी हैं तो 80 साल की सुगनी देवी भी शामिल हैं. वहीं 3 साल के अश्विनी से लेकर बड़ी संख्या में युवक युवतियां, महिलाएं पुरूष श्रद्धालु बस बाबा के दर्शनों की चाह लिए भक्ति मार्ग पर कदम बढ़ा रहे हैं. पैरों में छाले हों या फिर घुटनों में दर्द या और कोई पीड़ा, सबको बाबा के जयकारे की बूटी से भक्त भुलाकर बस बाबा से मिलन की आस लिए मुस्कान के साथ लक्ष्य की ओर अग्रसर हैं. रास्ते में जगह-जगह बाबा के भक्तों की सेवा के लिए सेवकों की टोलियां जुटी हुई हैं. झांझोत में शहीद राजेश कुमार के परिवार ने भी बाबा के धाम को जा रहे भक्तों की जमकर सेवा की. सेवक भक्तों को चाय-नाश्ते, जूस से लेकर भोजन तक की सेवा कर रहे हैं. वहीं कई जगह सेवकों ने चिकित्सा कैंप भी लगा रखें हैं. जिनमें भक्तों को चिकित्सा सुविधा भी मुहैया कराई है. भक्ति की जीती जागती तस्वीर इस पूरे मार्ग पर देखने को मिल रही है. आस्था, प्रेम और विश्वास का संगम इन दिनों इस भक्ति मार्ग पर नजर आ रहा है. भजनों पर झूमते भक्तों के चेहरों पर जरा भी थकान या पीड़ा की शिकन तक नजर नहीं आती. ये सब उस असीम शक्ति की करामात ही है जिसके विश्वास के सहारे लाखों भक्त खाटू पहुंचते हैं. भक्तों की मान्यता है कि मनोकामना लेकर गए हैं तो वो अवश्य ही पूरी होती है. बाबा के दर देर है अंधेर नहीं. तभी तो कहा गया है श्याम धणी को हारे का सहारा. और निशान थामे भक्त कहते हैं कि डोरी खेंच के राखिजे ओ है बाबा को निशान. पैदल चालणिया कै सागै चालै बाबो श्याम। 

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