क्या आप जानते हैं उस 'हवा सिंह' को जिसने अपने मुक्के के दम पर 11 साल तक रिंग में अपनी बादशाहत कायम रखी ?

आपने मोहम्मद अली का नाम सुना है? जी हां बॉक्सर मोहम्मद अली ! अरे वाह आपको तो जानकारी है उनके बारे में। अच्छा आपने माइक टाइसन का नाम सुना है? हां हां वही मुक्केबाज जो अपने प्रतिद्वंद्वी का कान खा गए थे! बहुत अच्छे, आपको सच में बहुत जानकारी है। अच्छा एक आखिरी सवाल, क्या आप हवा सिंह को जानते हैं ? नहीं ? सच में नहीं ? चलिए तो आपकी जानकारी बढ़ाते हैं और आपको बताते हैं कि ये हवा सिंह कौन थे और आपको इनके बारे में क्यों पता होना चाहिए। हवा सिंह उस तूफान का नाम था जिसने अपने देश ही नहीं बल्कि पूरे एशिया में अपने मुक्के का दम दिखाया। ये वो शख्सियत थे जिसने बड़े बड़े मुक्केबाजों को अपने दमखम से उखाड़ फेंका। हवा सिंह के हौसले का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि उनकी दिली तमन्ना थी कि वो ओलंपिक में जा कर मोहम्मद अली का मुकाबला करें लेकिन किन्हीं राजनीतिक कारणों के चलते उनका ये सपना सपना ही रह गया। उनका नाम भारत में ही नहीं एशिया में ‘हेवीवेट विजेता’ के रूप में प्रसिद्ध रहा। उन्होंने एशियाई खेलों में न केवल हैवीवेट का खिताब जीता बल्कि अगले एशियाई खेलों तक उसे बरकरार रखा। 16 दिसम्बर, 1937 को गुलाम भारत की धरती पर जन्म लिया उस बच्चे ने जिसे गुलाम नहीं रहना था। उसका नाम ही रखा गया हवा सिंह, वो हवा जिसे किसी बंधन में नहीं बांधा जा सकता। हरियाणा, भिवानी के एक गांव उमरवास में जन्में हवा सिंह भारत के सर्वश्रेष्ठ मुक्केबाजों में से एक थे। हवा सिंह वर्षों तक मुक्केबाजी से जुड़े रहे और इस खेल को नई दिशा दे कर देश का नाम रोशन किया। उन्होंने ना केवल बॉक्सर के रूप में देश का नाम रौशन किया बल्कि अन्त तक इस खेल से जुड़े भी रहे। हवा सिंह 1956 में भारतीय सेना में भर्ती हुए। इस समय उनकी आयु मात्र 19 वर्ष थी। यहीं से उन्होंने मुक्केबाजी के खेल में अपना कदम रखा और फिर कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा। 1960 में वो वेस्टर्न कमांड के चैम्पियन रहे। उन्होंने उस समय के मौजूदा चैम्पियन मोहब्बत सिंह को हरा कर वेस्टर्न कमांड के चैम्पियन का ख़िताब अपने नाम किया। हवा सिंह नेशनल बॉक्सिंग चैम्पियन भी रहे और वो भी कोई एक दो बार नहीं बल्कि 1962 से 1972 तक लगातार ग्यारह साल उन्होंने इस खिताब को अपने कब्जे में रखा। इस दौरान कोई भी बॉक्सर उनके सामने टिक नहीं पाया। आज की तारीख में भी कोई मुक्केबाज उनके बनाए रिकार्ड की बराबरी नहीं कर पाया है। 1962 में एशियाई खेलों का आयोजन जकार्ता में किया गया। इस दौरान भारत और चीन के बीच युद्ध ठना हुआ था। इन खेलों के लिए हवा सिंह पूरी तरह तैयार थे। लेकिन भारत उस समय खेलों के प्रति इतना सजग नहीं था और यही कारण रहा कि हवा सिंह जकार्ता एशियाई खेलों का हिस्सा नहीं बन पाए। लेकिन हवा सिंह तो हवा थे इन्हें रोक पाना संभव कहां था। अगले एशियन खेलों का आयोजन हुआ थाईलैंड की राजधानी बैंकाक में। हवा सिंह को तो बस मौका चाहिए था और उन्हें ये मौका यहां मिला। हवा सिंह ने स्वर्ण जीता और इसी के साथ बॉक्सिंग रिंग में हवा सिंह के साथ भारत का भी डंका बज उठा। कहते हैं उपलब्धी प्राप्त करना उतनी बड़ी बात नहीं जितना उस उपलब्धी के खुद को उस उपलब्धी के काबिल बनाए रखना है। हवा सिंह के लिए ये बड़ी चुनौती थी। उन्हें आगे भी खुद को इस ख़िताब के योग्य बनाए रखना था। हवा सिंह ने अपनी सारी ताकत झोंक दी प्रैक्टिस में । सन 1970 में अगले एशियाई खेलों का आयोजन भी बैंकाक में ही हुआ। हवा सिंह ने खुद को इस ख़िताब के काबिल बनाए रखा और लगातार दूसरी बार एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीत कर इतिहास रच दिया। आज भी हवा सिंह इकलौते ऐसे भारतीय बॉक्सर हैं जिन्होंने एशियाई खेलों में लगातार दो गोल्ड मैडल जीते। ये रिकार्ड तीन स्वर्ण पदकों के साथ और भी बड़ा होता यदि रेफरी ने विवादस्पद फैसला नहीं सुनाया होता तो। 1972 में एशियाई खेलों का आयोजन तेहरान में किया गया। यहां हवा सिंह ने अपने ईरानी प्रतिद्वंद्वी बूरा को अंतिम राउंड में नाकआउट कर दिया और लगातार तीसरी बार विजेता बन गए लेकिन रेफरी द्वारा लिए गए एक विवादस्पद निर्णय ने उनसे उनका वो तीसरा पदक छीन लिया जिसके हवा सिंह वास्तव में हकदार थे। हवा सिंह ने एशियाई खेलों में दो स्वर्ण पदक जीतने के अतिरिक्त भारतीय बाक्सिंग के इतिहास में अन्य कई शानदार पन्ने जोड़े। उन्होंने 1961 से 1972 तक यानी 11 वर्षों तक अपने वजन के वर्ग में राष्ट्रीय स्तर पर चैंपियनशिप जीती जो अपने आप में बड़ी उपलब्धि है तथा ‘सर्विसेज’ में इतने ही वर्षों तक सफलता अर्जित की। कोई अन्य बॉक्सर इतने अधिक वर्षों तक राष्ट्रीय स्तर पर चैंपियनशिप तथा ‘सर्विसेज’ में चैंपियनशिप हासिल नहीं कर सका है। 1980 में हवा सिंह ने बॉक्सिंग से सन्यास ले लिया तथा वापस भिवानी आ गए। अब सवाल ये था कि क्या उनकी जगह कोई दूसरा बॉक्सर ले सकता है, जवाब था नहीं। हवा सिंह ने इस खेल में जिस ऊंचाई पर अपना नाम स्थापित कर दिया था वहां तक किसी दूसरे का पहुंचना संभव नहीं था। सन्यास लेने के बाद भी हवा सिंह ने बॉक्सिंग से मुंह नहीं मोड़ा। उन्होंने भिवानी बॉक्सिंग शाखा के चीफ कोच का पदभार संभाला और अपने पहले बैच में 10 बच्चों को ट्रेनिंग देना शुरू किया। अर्जुन अवार्ड विजेता राजकुमार सांगवान ने 10 बच्चों के उसी बैच में ट्रेनिंग प्राप्त की जिन्हें हवा सिंह ने ट्रेनिंग दी थी। हवा सिंह ट्रेनिंग के वक्त थोड़ी भी दया दिखने के पक्ष में नहीं रहते थे। वो आर्मी स्टाइल में ट्रेनिंग देते थे। सांगवान ने उनके बारे में बताया था कि वह सभी को सुबह से कंक्रीट के फर्श पर दौड़ने के लिए कहते। सबके पैरों में आम पी टी शूज होते थे, जिनकी सोल बहुत पतली होती है। वो लगभग आधे दिन तक सभी की उसी कंक्रीट के फर्श पर दौड़ लगवाते। दिन ख़त्म होते तक सभी के पैरों में मोटे मोटे छले पड़े हुए होते थे। सांगवान की मांसपेशियां मजबूत थीं तथा वो इतना होने के बाद भी सीधे खड़े होने में सक्षम रहते थे। लेकिन इसके बाद ही हवा सिंह कहते कि चलो अब ट्रेनिंग करते हैं। इस तरह की हालत में किसी के लिए ट्रेनिंग करना नरक की यातनाओं से कम नहीं होगा। सांगवान इन सब से तंग हो गए और ट्रेनिंग छोड़ अपने गांव लौट आए। लेकिन हवा सिंह ने सांगवान का पीछा नहीं छोड़ा और उन्हें ढूंढते हुए उनके घर तक आ पहुंचे। पहले वो राजकुमार के पिता से मिले जिन्हें वो पहले से जानते थे। इसके बाद वो सांगवान के पास आए और कहा कि “जानता हूं ये कठिन है लेकिन मेरी मान तो तू छोड़ कर मत जा, तू बड़ा बॉक्सर बनेगा।” सांगवान कैम्प लौट आये और जम कर मेहनत की। वह कुछ ही समय में वो हवा सिंह के पसंदीदा शिष्य बन गए। आगे चल कर सांगवान ने 4 अंतरराष्ट्रीय स्वर्ण पदक जीते जिसमें सबसे अहम था 1994 में तेहरान एशियन चैम्पियनशिप में जीता हुआ स्वर्ण पदक। हवा सिंह ने रिटायर होने के बाद भी बॉक्सिंग से नाता नहीं तोड़ा और भिवानी बॉक्सिंग क्लब की शुरुआत करते हुए काबिल मुक्केबाजों को प्रशिक्षण देना शुरू कर दिया। इसी भिवानी बॉक्सिंग क्लब ने देश को अखिल कुमार, विजेंद्र सिंह और जितेन्द्र कुमार जैसे बॉक्सर दिए हैं। उनकी सफलता को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें 1966 में ‘अर्जुन पुरस्कार’ से सम्मानित किया और 1968 में सेनाध्यक्ष द्वारा उन्हें ‘बेस्ट स्पोर्ट्समेन ट्रॉफी’ प्रदान की गई। 1999 में हवा सिंह को ‘द्रोणाचार्य पुरस्कार’ देने की घोषणा की गई, परन्तु जब उन्हें 29 अगस्त, 2000 को यह पुरस्कार दिया जाना था, उसके ठीक 15 दिन पूर्व 14 अगस्त 2000 को उनका भिवानी में अचानक निधन हो गया। उनका यह पुरस्कार उनकी पत्नी अंगूरी देवी ने प्राप्त किया। बॉक्सिंग का ये महारथी मात्र 62 वर्ष की आयु में इस दुनिया को अलविदा कह गया। असल में हवा सिंह जैसे खिलाड़ी ही असल स्टार हैं लेकिन दुखद यह है कि समय के साथ इन्हें भुला दिया जाता है। कोशिश करें कि आपके बच्चे हवा सिंह जैसे महान खिलाडियों के बारे में जरूर जानें। वो भले ही आज हमारे बीच नहीं लेकिन उन्होंने बॉक्सिंग के प्रति अपना पूरा जीवन समर्पित करते हुए देश को इतना कुछ दिया कि हम सदैव उनके ऋणी रहेंगे। आज उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें शत शत नमन और भावपूर्ण श्रद्धांजलि।

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