एक गांव ऎसा भी जहा हर दूसरे घर में एक फौजी

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राजस्थान वीरों की भूमि है । उसमें भी मारवाड का कोई सानी नहीं है । रियासत काल हो या फिर आधुनिक भारत हर समय में यहां के वीरों ने अपनी गहरी छाप छोडी है । मारवाड में जोधपुर जिले में कई ऐसे गांव है । जहां से सैंकडों की संख्या में युवा देश की सेवा व सुरक्षा के लिए सेना में भर्ती होते हैं। ऐसा ही एक गांव है सालवां कलां इस गांव में हर दूसरे घर में एक फौजी है। गांव के तीन जवान देश की रक्षा करते करते शहीद भी हो चुके हैं इनमें शिवजीराम जो कि 1971 की लडाई में शहीद हुए थे । यह वह समय था जब सिर्फ सूचना आती थी शव नहीं। इसके बाद 2000 में कुपवाडा में शहीद हुए निंबाराम डूडी व 2015 पाबूराम चौधरी। गांव के युवा के लिए यह शहीद आदर्श है । जिसके चलते भर्ती में जाने से पहले वे शहीदों को सलाम कर ही निकलते हैं। यह है सालवा कलां गांव जोधपुर से करीब 25 किमी की दूरी पर । यह गांव सेना में जवान देने के लिए मशहूर हो रहा है। करीब 2500 घरों की आबादी में एक हजार से ज्यादा युवा सेना, सीआरपीएफ, बीएसफ व पुलिस में है। 2000 से ज्यादा सेवानिवृत सेैनिक भी है। सालवां कला का मारवाड के इतिहास में बडा योगदान है । अगर इस गांव में वीर दुर्गादास राठौड जन्म नहीं लेते तो शायद आज जोधपुर नहीं होता । दुर्गादास राठौड ने अपनी मातृ भूमि के लिए अपना सबकुछ न्यौछावर कर दिया था । आज यह युवा भी उनके नक्शे कदम पर चल रहे हैं। देश के लिए मर मिटने के लिए तत्पर हैं । वही यहां के युवा जब भी शहीदों के सामने से निकलते हैं । तो उनको सलाम करना नहीं भूलते है। खासतौर से जब वे सेना भर्ती के लिए जाते हैं तो । इन शहीदों की प्रेरणा से सेना की हर भर्ती में सालवां के जवान चयनित होते हैं। शहीद हुए जवानों के परिवारेां को उन पर हमेशा नाज रहता हैं। शहीद पाबूराम के भाई पूनाराम बताते हैं कि वे अपने बेटों को भी सेना में भेजेंगे । ओर जरूरत पडी तो खुद भी सेना मे जाएगे ।

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