यह भारत की तस्वीर जिनके हाथों में कलम होनी चाहिए थी उनके हाथों में शराब के खाली क्वार्टर ह

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यह भारत की तस्वीर जिनके हाथों में कलम होनी चाहिए थी ? उनके हाथों में शराब की खाली क्वाटर है। जिनके बस्ते में किताबे होनी चाहिए थी ? उनके बस्तों में है शराब की खाली क्वार्टर। जिनके पैरों में चपले होनी चाहिए थी उनके नंगे पैर। उल्लेखनीय है कि सर्किल पत्रकार की टीम मुख्यमंत्री कि विधान सभा क्षेत्र झालरापाटन के गांव सामरिया से सिरपोई सड़क से गुजर रही थी। तो सड़क के किनारे लगभग 5 बच्चे बच्चियां जिनकी उम्र 5 वर्ष से 10 वर्ष के बीच में थी जिनके पांव नंगे थे कपड़े फटे पुराने थे। यह बच्चे सड़क के किनारे शराब के खाली क्वार्टर इकट्ठा करते हुए मिले। जब उनसे पूछा गया तो उन्होंने बताया की इन खाली क्वार्टर को बेचकर हमारे मां बाप घर का खर्चा चलाते हैं। उसके थोड़ी देर बाद इन बच्चों को प्यास लगी तो सड़क के किनारे प्रदूषित पानी से भरा हुआ गड्डे में पानी पीने लग गए। सवाल यह पैदा होता है कि सरकार के बड़े बड़े दावे फेल हो रहे हैं गरीबों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध नहीं होता और मुख्यमंत्री की खाद्यान्न योजनाओं का लाभ भी इनको नसीब नहीं होता। बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ का स्लोगन भी फेल होता हुआ नजर आता बेटी के हाथ में कलम होनी चाहिए जबकि उसके हाथ में शराब के खाली क्वार्टर है उन्हें पेट की भूख मिटाने के लिए मजबुरी में सब करना पड़ता है। नेताओं के वादों से इनकी पेट की प्यास भूख नहीं मिट सकती।

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