बांस का जीवन संकट

जिस पेड़ की बनी लाठी से सदियों तक शासन हुआ, डंडे से कानून पालन , गांव का मकान बना, गाड़ी बनी, चारपाई बनी, मचिया बनी, जीवन की अंतिम यात्रा जिस सिंहासन पर बैठ कर श्मशान घाट तक हुई उस' पेड़ बांस का जीवन संकट में है। बास एक सामान्य पेड़ नहीं है, यह पूज्य वृक्ष है। इसकी डोली मे पालकी पर बैठकर हमारे घर में लक्ष्मी आई है, जननी आई है, मां आई है। भारत में प्राचीन काल से कई प्रकार की युद्ध कलाए प्रचारित है प्राचीन काल का सबसे पुराना अस्त्र लाठी है, लाठी आमतौर पर बांस की होती है। इसकी लंबाई 5 से 7 फिट होती है अधिकांश ग्रामीण भारतीय अपने साथ लाठी रखना गौरव की बात समझते हैं। इसके लेने के लिए किसी खास प्रशिक्षण की जरूरत नहीं होती, ना ही लाइसेंस लगता है लाठी से खेल भी होता है जिसे लाठी खेल कहते हैं। लाठी लेना एक योग व्यायाम और कसरत है। जब मनुष्य को अपनी असुरक्षा महसूस होती, जीव जंतुओं से बचने के लिए, दुश्मनों से रक्षा के लिए, पत्थर के टुकड़ी के बाद तब उसने लाठी को अपना हथियार बनाया, मित्र बनाया मानव सभ्यता विकसित हुई लाठी नाम के शस्त्र ने जन्म लिया। लाठी चलाने की कला का जन्म भारत के गांव में हुआ लाठी एक ऐसा अस्त्र है जिससे गांव के किसान हमेशा अपने साथ रखते हैं आत्मरक्षा के साथ गौरव का प्रतीक है। जिसके पास बल की शक्ति है वही विजय का अधिकारी है। लाठी के बल पर लाठी कला के जानकार जनों को लट्ठैत कहा जाता है। जमींदारों, साहूकारों, तानाशाह ने लाठी के बल पर लंबा शासन किया, आज भी लोग लाठी से डरते हैं। भगवान कृष्ण के जन्म स्थान वृंदावन में लट्ठमार होली खेली जाती है भगवान कृष्ण के मित्र ग्वाल बालों ने लटिया लगाकर गोवर्धन उठाने के लिए लटिया का प्रयोग किया।प्रायः लाठी का प्रयोग सुरक्षा के लिए किया जाता है। सुरक्षाकर्मी जानवर चराने वाले बड़े जी अपने पास लाठी सदैव रखते हैं। लाठी में गुण बहुत हैं। सदा राखिए संग, गहरी नदिया नाले मै बचावे अंग। झपट कुत्ता को मारे, दुश्मन दावा गीर ताहू को दय ललकारे। कवि गिरिधर कहते हैं। कह गिरधर कविराय सुनो हूं मेरे साथी, सब हथियार छोड़ हाथ मा लीजिए लाठी। जवाब किसी बांस की लाठी डंडा को तेज गति से लगाते हैं तो आवाज होती है। रामायण काल में महाभारत काल में पौराणिक काल में डंडा लाठी भाला का उल्लेख मिलता है गांधी जी सदा अपने साथ लाठी रखते थे। अस्त्रों के बिना शांति की कल्पना आप शांति काल में भी नहीं कर सकते।थे। चूड़ी वाली लाठी, भोपाली लाठी, कलिंजर लाठी, महोबिया लाठी, बावनी लाठी भोपाल मंडला कालिंजर में इसका बांस पहले बहुत होता था। जिससे लाठी बनती थी प्रतिदिन मेरे गांव के कुछ लाठी रखने वाले 50 से 100 ग्राम तेल पिलाते हैं। लाठी का वजन 500 ग्राम से ढाई किलो तक का होता है लाठी ₹100 से लगाकर ₹600 तक की मिलती है। कई जगह लाठियों का मेला लगता है, लाठी को बनाना काटना पकाना, कड़ा लगाना, मजबूत बॉस से लाठी बनना एक कला है, जो योग्य कारीगर कर सकता है। बस से बर्तन बनते , बांस से कुर्सी बनती है, अलमारी बनती है बेड बनते हैं गरीब की झोपड़ी बनती है, बांस के वृक्ष की आवश्यकता न्यायालय में भी पढ़ती है। कानून व्यवस्था को सुधारने के लिए पिछले कई वर्षों में देश के विभिन्न राज्यों में कई करो रुपए के डंडे खरीदे गए वर्तमान में बांस न मिलने के कारण प्लास्टिक के डंडे खरीदे जा रहे हैं। चारपाईया लोहे की आ गई है। कुर्सी प्लास्टिक की हो गई है क्योंकि हम बास को नहीं बचा पा रहे यदि हमने लगातार बांस के वृक्ष की उपेक्षा की तो 1 दिन ऐसा आएगा जब बस केवल कागज के पन्ने में पढ़ा जाएगा। आने वाली पीढ़ी बांस देखने को तरस जाएगी आज भी अच्छी क्वालिटी का देसी बॉस जिसे वंश कहते हैं,शायद ही किसी गांव में लगा हो। बांस की कलम बांस के कागज से हमारी पीढ़ी ने पढ़ा हम उसे भूल रहे हैं। सर्वोदय कार्यकर्ता होने के नाते मेरी प्रार्थना है कि इस पेड़ को बचाने के लिए आगे आए, बांस के पेड़ से बने बर्तनों, फर्नीचर से भारत के कई राज्यों में गरीब जनता को भोजन मिलता है। बांस के बर्तन बनाने वाले कारीगर आज भी गांव में है कोई बास के बर्तन ही नहीं खरीद रहा आसाम, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, बंगाल में बांस के वृक्ष को बहुत महत्व दिया गया है वैसे हमारे शास्त्र धर्म में बांस को वंश वृक्ष माना है। हमारे देश में बांबू बांस को अनेक नामों से पुकारा जाता है । जैसे ...... वंश, बॉस, बेठू, प्रकृति ने हमारे देश को बास के रूप में एक ऐसी वनस्पति प्रदान की है जो आदि अनंत काल से हमारी सभ्यता का अभिन्न अंग है, अंतिम आदमी से जुडी है यह ऐसा संसाधन है जो कृषि ग्रामीण व्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देता है। रोजगार स्वरोजगार निर्माण करता है, और पोषण मूल्य होने के कारण कुपोषण और रक्त हीनता को दूर करता है। इस पेड़ से भवन निर्माण, फर्नीचर निर्माण, हस्तकला के कारीगरों को रोजगार मिलता है इस वृक्ष की ग्रामोदय, सर्वोदय, अंत्योदय की भूमिका है। मानव के मकान घर, सामान, साज, सज्जा, उपकरण में बांस वृक्ष का बहुत बड़ा योगदान है प्रकृति का हरा सोना है। देश विदेश में इस वृक्ष तथा इस वृक्ष के शिल्पकारओं की आवश्यकता है और रहेगी। दिव्यांग की बैसाखी, वृद्ध की लाठी डंडा एक विज्ञान है। जो जानते हैं जिस घर में बांस लगा होता है उस घर की परेशानी दूर रहती हैं। ज्योतिष शास्त्र नेत्र विज्ञान के अनुसार बांस वृक्ष के दर्शन हर समय ऑफिस में, घर में करते रहना चाहिए। इस जानकारी में कोई गलती हो तो क्षमा कर दें। ठीक हो तो खुद पढ़ें इस वृक्ष को बचाने की कोशिश करें, साथियों को बताएं मैंने इस वृक्ष के गुण और लाभ को नजदीक से देखा है।

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