निस्प्रयोज्य साबित हो रहे शौचालय

स्वच्छ भारत मिशन के अंतर्गत बने शौचालय अभी भी निश्प्रयोज्य साबित हो रहे हैं । सरकार की अति महत्वाकांक्षी योजना धरातल पर मूर्त रूप नहीं ले पा रही है । ग्रामीण आज भी खुले में शौच करने पर मजबूर हैं । ग्रामीण आज भी सरकार के द्वारा बनाए गए शौचालय में उपली कंडा का ही प्रयोग करते हैं । सरकार द्वारा प्रति शौचालय ₹12000 निर्धारित की गई थी । एक अभियान के तहत खुले में शौच मुक्त भारत करने का लक्ष्य रखा गया था । कागजों में तो 90 प्रतिशत ओडीएफ हो चुका है । लेकिन धरातल पर गांव की 90% जनसंख्या आज भी खेत खलिहान में शौच के लिए जाती है । शौचालय निर्माण के बाद सरकार की मंशा थी कि पूरा परिवार शौचालय का ही प्रयोग करें । लेकिन यह धरातल पर मूर्त रूप नहीं ले पा रही है । इसका ताजा उदाहरण सुखई पुर निवासी चौथी राम का बना शौचालय है जो देखने से ही प्रतीत होता है कि शौचालय का इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है । शौचालय के ठीक सामने छप्पर रख लिया है । छप्पर के कारण दरवाजा नहीं खुल सकता । इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि जिस शौचालय का गेट नहीं खुल सकता तो परिवार वाले शौचालय का प्रयोग कैसे करते होंगे । कमोवेश यही हाल तहसील क्षेत्र के हर गांव का है।

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