गौर कीजिए इन युवाओं की कोशिश पर...

ये कतार मतदान की नहीं, रक्तदान के लिए थी। चुनाव की कडुवाहट और मौसम की गर्मी से बेपरवाह। तब जब हर हाल में जीत की खातिर जाति-मजहब के आंकड़ों पर माथापच्ची चल रही। सूरज चटक रहा है। जुबानें भी तल्ख़ हैं। किसी को पास लाने के लिए दूसरे से दूर किया जा रहा है। इनसे बेखबर वे अपने रास्ते पर हैं। वह जो इंसानियत का रास्ता है। पास लाने। जोड़ने। प्रेम बांटने। मदद करने। भेदभाव से दूर रहने। सबको साथ लेकर चलने। करुणा। सहयोग-सदभाव का रास्ता।       ऊर्जा-उत्साह से भरे ये युवा हैं। सुल्तानपुर में अंकुरण फाउंडेशन उनकी संस्था है। पांच अप्रैल को दो साल पूरे किए। स्थापना दिवस पर लक्ष्य था चार सौ यूनिट रक्तदान का। भोर से कतार लगी। शाम तक तादाद छः सौ पहुंच गई। शेष बचे अगले शिविर में सहयोग करेंगे। एक दिन में छह सौ यूनिट रक्तदान एक कीर्तिमान है। कीर्तिमान बनाने वाले चाहते हैं, ये टूटे। वे तो प्रेरणा के दीपक जलाते हैं। दूर तक उजाले के लिए। उनका रक्तदान रस्मी नहीं है। साल भर चलता है। कोई आपदा हो। कोई लाचार जिंदगी के लिए जूझ रहा हो। वे बार-बार आगे आते हैं। नारी शक्ति उनसे कदमताल कर रही। शिविरों में समूह में तो और मौकों पर जरूरत पर। बारह सौ यूनिट से अधिक वे रक्तदान कर चुके हैं। किसी परिचय-प्रचार-प्रलोभन से दूर बहुत दूर।   वे सड़कों पर भटकते विक्षिप्तों को साथ लेते हैं। उन्हें नहलाते-धुलाते दवा-दरमत करते-कराते हैं। अस्पताल में पड़े लावारिसों की मरहम-पट्टी, साफ-सफाई करते हैं। आखिरी सांस बाद जिनका कोई नही उनके शवों का अंतिम संस्कार करते हैं। जो हाथ इस काम में आगे बढ़ते हैं, वे मजहब नहीं पहचानते। भूले-भटको-बिछड़ों को उनके घर -परिवार से मिलाते हैं। ऐसे बीस से अधिक परिवार जो अपने प्रियजन खो निराश हो चले थे, अंकुरण की कोशिशों पर निहाल हुए। वे सेवा की छांव देते हैं, तो पर्यावरण संरक्षण की सीख। कोरी नसीहतें नहीं बांटते। पौधे लगाते हैं। उन्हें जल- जीवन देते हैं। जल की स्वच्छता और संरक्षण के लिए जागरूक करने में वे जुटे हैं। झुलसती गर्मी में वे प्यासों को पानी पिलाते हैं। स्वच्छता का संदेश भाषणों में नहीं आचरण में उतार कर देते हैं। बस स्टेशन का आजाद पार्क गोद लिया। साफ़-सुथरा और चमका कर उसे छोड़ नहीं दिया। रोज सफाई। पूरी चौकीदारी करते हैं वे। गरीबों के लिए उनके कपड़ा बैंक से साल भर कपड़े बंटते हैं। पढ़ने वाले बच्चों के लिए उनके बुक बैंक में किताबों की कमी नहीं। मेधावी बच्चों के लिए उनकी निःशुल्क कोचिंग चलती है। पढ़ने वाले निर्धन बच्चों की फ़ीस चुकाते हैं। सब साधन मुहैय्या कराते हैं।  जरूरतें पूरी करते हैं। पढ़ने की शर्त के साथ।    आंसुओं को पोंछने। दर्द को बांटने। चेहरों पर मुस्कान लाने की इन कोशिशों के आगे-पीछे कोई एजेंडा नहीं। कोई सरकारी इमदाद नहीं। चाहत भी नहीं। दल नहीं। नेता नहीं। डॉक्टर शालिनी पांडे दिल्ली में रहकर उनके कार्यक्रमों को गति देती हैं। बेहद व्यस्त डॉक्टर सुधाकर सिंह सक्रिय मार्गदर्शन करते हैं। डॉक्टर आशुतोष और सुशील कुमार सिंह खूब काम करते हैं लेकिन मंच पर आने को राजी करने के लिए उनकी टीम को शोर मचाकर मजबूर करना पड़ता है। लावारिसों का दाह संस्कार करने वाले आरिफ खान बड़ी मुश्किल से मंच पर आते हैं। अभिषेक सिंह के जज़्बे पर डॉक्टर सुधाकर भावुक होते हैं। जोश से भरी एक बड़ी टीम है। नाम नही। ये अपने काम से पहचानी जाती है। रचनात्मक सोच के। बड़े दिल के । हंसते-खिलखिलाते। प्रतिभावान नौजवान। पास बुलाते। गले लगाते। दूरियां मिटाते। मिलिएगा ?

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