राहुल अमेठी में रुकेंगे ?

यह चौथा मौका है जब राहुल गांधी लोकसभा के लिए अमेठी से मैदान में हैं । पहला मौका है जब अटकलें इस बात को लेकर हैं कि चुनाव बाद वह संसद में किस सीट की नुमाइंदगी करेंगें ? 2004 से संसदीय राजनीति में दाखिले के बाद पहली बार राहुल गांधी दो सीटों पर चुनाव लड़ रहे हैं। वायनाड (केरल) से उनका नामांकन हो चुका है। बुधवार को अमेठी से पर्चा दाखिल होगा। भाजपा मानती है कि तय हार जान उन्होंने वायनाड भी चुना। कांग्रेस दोनों सीटों से जीत को लेकर आश्वस्त है। ऐसा हुआ तो वह फिर कौन सी सीट छोड़ेंगे ?         गांधी परिवार में राहुल के पहले उनकी दादी इंदिरा जी और मां सोनिया गांधी दो सीटों से चुनाव लड़ चुके हैं। इंदिरा जी 1977 में रायबरेली से समाजवादी नेता राज नारायण से चुनाव हार गई थीं। 1980 में उन्होंने रायबरेली और मेडक (अब तेलंगाना में ) दो जगह से चुनाव लड़ा था। दोनों से वह जीतीं थीं। रायबरेली में उन्होंने हार का हिसाब चुकता किया। फिर यह सीट अपने परिवार के सदस्य अरुण नेहरु के लिए छोड़ी। 1981 के उपचुनाव में अरुण नेहरु ने रायबरेली से जीत दर्ज की थी। इंदिरा जी ने तब रायबरेली सीट क्यों छोड़ी और मेडक क्यों रोकी ? एक वजह मानी जाती है कि 1977 की जनता लहर में भी दक्षिण ने इंदिरा जी का साथ दिया था। 1980 में भी दक्षिण ने उस साथ को कायम रखा था। इंदिराजी का 1980 में वहां रुकना क्षेत्र के प्रति आभार प्रदर्शन माना गया।  दूसरी ज्यादा तर्कसंगत वजहें थीं। इस चुनाव में उत्तर प्रदेश सहित पूरे उत्तर भारत में कांग्रेस की वापसी हुई थी। उत्तर प्रदेश ने कांग्रेस को निश्चिंत कर दिया था। अविभाजित उत्तर प्रदेश की लोकसभा की 85 में 50 सीटें कांग्रेस जीत गई थी। साथ में विधानसभा चुनाव में कांग्रेस 309 सीटों के साथ फिर से प्रदेश में सत्ता में वापस आ गई थी। रायबरेली से गांधी परिवार के भावनात्मक जुड़ाव को जाहिर करने के लिए परिवार के एक सदस्य अरुण नेहरू उपलब्ध थे।     1991 में राजीव गांधी के निधन के बाद सोनिया गांधी ने राजनीति में दाखिल होने का फैसला लेने में काफी वक्त लिया था। 1998 में पार्टी अध्यक्ष के रुप में उनकी राजनीतिक पारी शुरु हुई। उनका पहला लोकसभा चुनाव 1999 का था। अमेठी और बेल्लारी (कर्नाटक ) दो जगह से वह लडीं। उनके दो जगहों से तब चुनाव लड़ने की वजहें समझी जानी चाहिए। उसके पहले के 1998 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में एक भी सीट नही मिली थी। 1996 के विधानसभा के चुनाव में प्रदेश में पार्टी 33 सीटों पर सिमट चुकी थी। अपने पहले संसदीय चुनाव के लिए उत्तर प्रदेश और अमेठी ( जहां परिवार के नजदीकी कैप्टन सतीश शर्मा 1998 में हारे भी थे) का चयन चुनौतीपूर्ण फैसला था लेकिन पार्टी की मुखिया के तौर पर यह वक्त की मांग थी। उनकी दूसरी सीट बेल्लारी पार्टी के लिए बेहद अनुकूल थी। 1999 के पहले के सभी ग्यारह लोकसभा चुनावों में कांग्रेस वहां जीती थी। गांधी परिवार की उत्तर से दक्षिण तक स्वीकार्यता का संदेश देने का यह सुरक्षित चयन था।    सोनिया गांधी दोनों स्थानों से जीतीं थीं। उन्होंने बेल्लारी छोड़ने और अमेठी से जुड़े रहने का फैसला किया था। पार्टी के कुल प्रदर्शन के लिहाज से कांग्रेस पूर्व की तुलना में इस चुनाव में न्यूनतम 114 सीटों पर पहुंच गई थी। लेकिन सोनिया गांधी जिन दो राज्यों से लड़ीं वहां कांग्रेस की सीटें बढ़ी थीं। कर्नाटक में 1998 में कांग्रेस नौ लोकसभा सीटें जीती थी। 1999 में सोनिया की अगुवाई में इस राज्य में पार्टी ने 18 सीटों पर जीत दर्ज की थी। 1998 में उत्तर प्रदेश में लोकसभा की कोई सीट न जीतने वाली कांग्रेस ने 1999 में सोनिया के दाखिले के साथ दस सीटें जीती थीं। तब उनके अमेठी के रुकने का एक बड़ा कारण उत्तर प्रदेश में पार्टी वापसी की कोशिशों से जोड़ा गया था। प्रदेश में 1989 से पार्टी सत्ता से बाहर थी। लोकसभा चुनाव में गुजरे चुनाव की शून्य से दस सीटों पर पहुंच ने भी उम्मीद दिखाई थी। तब सोनिया के अलावा गांधी परिवार का कोई अन्य सदस्य राजनीति में नहीं था। एक वजह जीत के अंतर को लेकर भी हो सकती है। अमेठी में सोनिया 4,18,960 वोट पाकर डॉ संजय सिंह ( 1,18,948 ) के मुकाबले 3,00012 वोटों के भारी फासले से जीतीं थी। तुलना में बेल्लारी की जीत छोटी थी। वहां सुषमा स्वराज ने कड़ी चुनौती दी थी। सोनिया को 4,14,650 और सुषमा को 3,58,550 वोट मिले थे। अन्तर 56,100 का था।      सोनिया गांधी की तुलना में राहुल के दो सीटों से चुनाव लड़ने के फैसले में फर्क को समझ जाना चाहिए। ऐसा ही फर्क 2014 में नरेंद्र मोदी के दो स्थानों के चुनाव लड़ने से भी जुड़ा है। उनकी मां सोनिया और धुर विरोधी मोदी दोनों ने अपने पहले चुनाव में दो क्षेत्र चुने। राहुल अमेठी में तीन चुनावों की लगातार जीत दर्ज करने के बाद चौथे चुनाव में दक्षिण से जुड़ाव का संदेश दे रहे हैं। भाजपा को उन पर प्रहार का इसलिए भी मौका मिल रहा है, क्योंकि 2009 में उन्हें मिले 71.78 फीसद वोट 2014 में 46.64 फीसद रह गए। 2009 की जीत का 3,64,108 का अन्तर 2014 में घटकर 1,07,903 रह गया। 2019 की अमेठी की मौजूदा तस्वीर कड़े मुकाबले का संकेत दे रही है। इस मुकाबले के नतीजों में पूरे देश को दिलचस्पी है। दूसरी उत्सुकता खासतौर पर समर्थकों में। अमेठी के साथ वायनाड के माफ़िक नतीजे हुए तो क्या राहुल अमेठी में रुकेंगे ? मौजूदा परिदृश्य इसकी संभावना को कम कर रहा है। हालांकि उत्तर प्रदेश में पार्टी की वापसी का जो सवाल 1999 में सोनिया के सामने था, वह 2019 तक बरकरार है। इस दरमियान पार्टी प्रदेश में और कमजोर हुई है। लेकिन एक बड़ा परिवर्तन यह है कि राहुल के बाद प्रियंका भी मैदान में आ चुकी हैं। औपचारिक तौर पर प्रियंका पर उत्तर प्रदेश की ही जिम्मेदारी है। 2019 के चुनाव के कुछ पहले प्रियंका के राजनीति में दाखिले के समय राहुल ने कहा था वह उत्तर प्रदेश में लंबे समय तक रुकने की तैयारी के साथ आ रही हैं। 2019 ही नहीं 2022 के चुनाव के लिए भी वह पार्टी को तैयार करेंगी। सोनिया के पास 1999 में उत्तर प्रदेश में परिवार के भीतर से कोई विकल्प नहीं था। राहुल के सामने ऐसी समस्या नहीं है। प्रियंका 2019 में चुनाव नहीं लड़ रही हैं। पर जब सक्रिय राजनीति में हैं तो जल्द ही चुनाव लड़ना चाहेंगी। कहां से ? फिलहाल इसमें कई अगर-मगर जुड़े हैं। पर एक बात याद रखनी होगी कि इंदिरा जी के वारिसों संजय गांधी, राजीव गांधी ,सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने संसदीय पारी की शुरुआत अमेठी से ही की। अवसर बना तो क्या प्रियंका परम्परा की उसी कड़ी से जुड़ेंगी ?

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