अमेठी का रण

अमेठी मीडिया की पहले भी चहेती रही है। इस बार उस पर और ज्यादा ध्यान है। वहां गांधी परिवार को पहले सिर्फ चुनाव में चुनौती मिलती थी। इस बार पांच साल की तैयारी के साथ भाजपा मुकाबले में है। यह ग्यारहवां चुनाव है, जब अमेठी से गांधी परिवार का कोई सदस्य चुनाव मैदान में है। चौथा मौका है, जब इस परिवार के राहुल गांधी अमेठी के रण में हैं। पहला मौका है, जब वह अमेठी के साथ वायनाड ( केरल ) से भी चुनाव लड़ रहे है। भाजपा को प्रहार तो लोगों को अटकल लगाने का मौका मिला है। राहुल अमेठी में रुकेंगे कि नही ?उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ गुरुवार को डेढ़ महीने के भीतर तीसरी बार अमेठी में होंगे। 28 फरवरी और 3 मार्च को भी वह अमेठी आये थे। प्रधानमंत्री मोदी चुनाव की घोषणा के पहले 3 मार्च को अमेठी में रैली कर चुके हैं। मुख्यमंत्री बनने के छः महीने के भीतर योगी 10 अक्टूबर 2017 को भी अमेठी आये थे। यह पार्टी अध्यक्ष अमित शाह की रैली थी। स्मृति ईरानी, केशव मौर्य सहित कई मंत्री साथ थे। भाजपा सरकारों के मंत्रियों की गुजरे पांच सालों में अमेठी में आमद-रफ्त तेज रही है। पार्टी और सरकार इसके जरिये अमेठी की फिक्र का साझा संदेश देती रही है। गुरुवार को स्मृति ईरानी के नामाँकन के मौके पर मुख्यमंत्री और अन्य मंत्रियों की मौजूदगी एक बार फिर दोहराने की कोशिश है कि उनके राज में अमेठी की पूछ में कसर नही रहेगी।2014 में अमेठी में राहुल की बढ़त 2009 की तुलना में 3,64,198 से घटाकर 1,07,903 पर पहुंचा देने के बाद से भाजपा उत्साहित है। 2017 के विधानसभा चुनाव में अमेठी की पांचों सीटों पर कांग्रेस की हार और उनमें चार पर अपनी जीत से भाजपा के हौसले उड़ान पर हैं। उसकी उम्मीदवार स्मृति ईरानी 2014 की हार के बाद भी अमेठी में डटी रहीं। केंद्र में मंत्रिपद ने उन्हें ताकत दी। उत्तर प्रदेश में भी अपनी सरकार ने उनका काम आसान किया । भाजपा अमेठी में 2014 से 2019 की तैयारी कर रही है।       अमेठी गांधी परिवार के नाते पहचानी जाती है। अपनी सरकारों के दौर में इस परिवार ने अमेठी के लिए बहुत कुछ किया है। चार दशकों का जुड़ाव। परिवार के चौथे सदस्य के हाथ फिलहाल अमेठी की कमान है। जड़ें गहरी हैं। भाजपा उसे उखाड़ फेंकने के लिए जुटी है। चालीस साल में गांधी परिवार ने अमेठी को क्या दिया ? विकास की असलियत क्या है ? एक ओर राहुल और उनके परिवार पर अमेठी की अनदेखी का आरोप । दूसरी ओर पांच साल में भाजपा की केंद्र और दो साल पुरानी प्रदेश सरकार द्वारा अमेठी के लिए किए किये कार्य गिनाए जा रहे हैं।       भाजपा अमेठी के लोगों को समझाने में लगी है। सिर्फ बड़े नाम से जुड़ने से हिस्से में क्या आया? 2019 के चुनाव के दो सबसे बड़े किरदार मोदी और राहुल हैं। मोदी के मुकाबले खिलाफ़ खेमा अभी उम्मीदवार ढूंढ रहा है। राहुल गुजरे पांच साल से अपने गढ़ में घिरे हैं। दक्षिण से जुड़ाव के नाम पर वह दूसरी सीट से भी लड़ने को मजबूर हुए हैं।     1977 की जनता लहर को छोड़कर अमेठी में अब तक गांधी परिवार अपराजेय रहा है। 1981 के राजीव गांधी के पहले चुनाव में असफल मुकाबला करने वाले शरद यादव जल्द ही अमेठी को भूल गए थे। 1984 में पराजित मेनका गांधी फिर अमेठी नही आईं। 1989 में विपक्ष के साझा उम्मीदवार राज मोहन गांधी का हार के साथ अमेठी से रिश्ता टूट गया। बीच के दौर में विपक्षी नामों ने अमेठी से चुनाव के साथ किनारा किया। लम्बे अन्तराल पर 2014 में स्मृति ईरानी ने अमेठी की लड़ाई को दिलचस्प बना दिया।     2014 में स्मृति चुनाव के सिर्फ तीन हफ्ते पहले अमेठी आईं थीं। वह कड़े मुकाबले में हारीं। वादा किया था। जीतूँ-हारूँ। अमेठी नही छोडूंगी। उस वायदे को उन्होंने निभाया। शायद ही देश का कोई ऐसा निर्वाचन क्षेत्र हो जहाँ पराजित ने विजयी प्रतिद्वन्दी को लगातार पांच साल तक उसके गढ़ में इतना छकाया हो। बेशक मंत्रिपद और अपनी सरकारों ने उन्हें ताकत दी। सरकार के मुखिया से निकटता और पार्टी के सहयोग ने उन्हें गति दी। लेकिन असली ताकत उनकी मेहनत और संकल्प शक्ति में छिपी है। स्मृति का अमेठी का साथ गांधी परिवार के लंबे जुड़ाव के पास नही फटकता। लेकिन कम वक्त में वह अमेठी और वहां के लोगों के नजदीक पहुंची। उन्होंने अमेठी की नब्ज़ को सही तरीके से परखा। जरूरतों को समझा। भारी-भरकम घोषणाओं की जगह ऐसी सहूलियतों-कामों से जोड़ा, जो देखने-सुनने में छोटी लेकिन बड़े जनजुड़ाव का जरिया बनीं। अमेठी में दाखिले के वक्त उनके पास टीवी के छोटे पर्दे की पहचान थी। पांच साल में उसे पीछे छोड़ वह अमेठी के गांवों- घरों में पहचानी जाने लगी हैं। उनके पास राहुल जैसी पारिवारिक विरासत और उन जैसा बड़ा नाम तो नही लेकिन उनका मुकाबला करने के लिए भरपूर आत्मविश्वास है। प्रतिद्वन्दी को घेरने का कौशल है। लक्ष्य के लिए डटे रहने का धैर्य भी। आरोपों के जबाब हैं तो सवालों के तीर चलाने का हुनर भी । वह भीड़ खींचती हैं और उसे बांधे रहने का उनमें सलीका है। अमेठी राहुल का इंतजार करती है। अमेठी यह भी जानती है कि स्मृति भी पहुंच रही हैं। राहुल के कारण अमेठी सुर्खियों में रहती है, तो स्मृति की चुनौती और तीखे हमले उसके रंग को गाढ़ा करते हैं।           एक ओर  सत्ता ने स्मृति को ताकत दी तो उससे जुड़े सवालों ने उनकी घेराबन्दी भी की है। अब शिकायतों पर जबाबदेही उनकी है। विधानसभा चुनाव की जीत ने पार्टी का आधार बढ़ाया। तो विधायकों के कामकाज का लोकसभा चुनाव में हिसाब हो रहा हैं। सक्रियता से कुछ नजदीक आये तो जबाब में रूठने वालों की कतार है। बहुत से काम हुए तो छूटे कामों-जरूरतों की फेहरिस्त लम्बी है। सत्ताजनित परेशानियों से स्मृति भी दो- चार हैं।        उधर  2014 में राहुल बचाव की मुद्रा में थे। अब वह आक्रामक हैं। सवाल उनसे नही सवाल वह पूछ रहे हैं। सवाल देश से लेकर अमेठी से भेदभाव तक जुड़े हैं। गुजरे पांच सालों में वह अपने निर्वाचन क्षेत्र के नियमित सम्पर्क रहे हैं। वहां की ज़रूरतों के पूरा न होने की जिम्मेदारी भाजपा पर डालने का उनके पास मौका है। वह आरोप लगाते रहे कि मोदी-योगी सरकार उनकी और अमेठी की नही सुनती। पलटवार होने पर उन्ही शिकायतों को और जोर-शोर से दोहराते हैं । बाकी देश की तरह अमेठी में भी मोदी सरकार के राफेल के भ्रष्टाचार, नोटबन्दी, जी एस टी से जुड़ी कठिनाइयों, किसानों-मजदूरों की बदहाली, समाज के हर तबके के बीच में दूरियां बढ़ाने और नफ़रत फैलाने के आरोप राहुल के भाषणों का हिस्सा हैं। पर इन सबसे अलग अमेठी की लड़ाई राहुल के चेहरे और गांधी परिवार के आभामंडल के इर्द-गिर्द सिमटी हुई है। राहुल की यह ताकत भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।    सपा यहां पहले भी नही लड़ती थी। उससे गठबंधन में बसपा ने भी इस बार अमेठी में उम्मीदवार नही उतारा है। दिलचस्प है कि मायावती बाकी उत्तर प्रदेश में कांग्रेस पर हमलावर हैं। ऐसे में न लड़ने के बाद भी अपने अमेठी के अपने वोटर को कांग्रेस के लिए कोई अनुकूल संदेश नही दे रही हैं। वैसे गांधी परिवार के बड़े चेहरे के आगे अमेठी में जातीय जोड़-घटाव का खास मतलब नही होता। मुद्दे भी इसलिए पीछे छूटते हैं। अन्य जगहों की तरह अमेठी में भी मुस्लिम मतदाता भाजपा को रोकने के लिए गोलबंद हैं। वहां उसके लिए राहुल इकलौते विकल्प हैं। पर बाकी मतदाताओं के बीच चुनने के लिए राहुल और मोदी के चेहरे हैं।    भाजपा ने मेहनत की है। उसका आधार बढ़ा है। विधानसभा की जीत ने उसका सबूत दिया है। तिलोई से कांग्रेस के पूर्व विधायक डाक्टर मुस्लिम भाजपा से जुड़ गए। गौरीगंज से बसपा के पूर्व विधायक चंद्र प्रकाश मटियारी और पिछले विधानसभा चुनाव में इसी क्षेत्र से बसपा प्रत्याशी विजय किशोर तिवारी भी भाजपा में शामिल हो गए। प्रतीकात्मक ही सही। पर ऐसे जुड़ाव किसी पार्टी को हौसला देते हैं। सच तो यह है कि भाजपा को असली ऊर्जा- उत्साह राहुल गांधी के अमेठी के साथ वायनाड से चुनाव मैदान से उतरने से मिला है। संसद के अपने चौथे चुनाव में अगर राहुल को दूसरा क्षेत्र भी चुनना पड़ा तो संदेश साफ़ है। अमेठी अब पहले जैसी आसान नही रही। उनके नामांकन के वक्त पूरा गांधी परिवार साथ था। यह बताने की कोशिश थी कि परिवार के लिए अमेठी कितनी महत्वपूर्ण है। यह भी कि परिवार आगे भी वहां से जुड़ा रहेगा। पर अमेठी अब सिर्फ भावनाओं की लहरों पर नही डोलती-रीझती। हासिल का हिसाब होने लगा है। राहुल सिर्फ अमेठी के नही प्रधानमंत्री पद के दावेदार हैं। उधर सामने स्मृति ईरानी हैं लेकिन प्रतिष्ठा नरेंद्र मोदी की दांव पर है। पांच साल से वह, उनकी सरकार और पार्टी अमेठी में राहुल को घेरने में लगी है। वहां कड़े मुकाबले की जमीन तैयार है। अगर आप किसी के भक्त या फिर विरोधी नही हैं , तो जल्दी फैसला सुनाने में ठिठकेंगे !

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