लखनऊ विकास प्राधिकरण एवं लखनऊ नगर निगम हैं ऐसे विभाग, जिनके सम्मुख सरकार लाचार

   लखनऊ में प्रदेश सरकार की आंख के नीचे दो ऐसे विभाग हैं, जो चिराग तले अंधेरा की कहावत चरितार्थ करते हैं। ये विभाग हैं लखनऊ विकास प्राधिकरण एवं लखनऊ नगर निगम। दोनों ही विभाग भ्रष्टाचार, घोटालों, कामचोरी, जनहित की उपेक्षा आदि के उदाहरणों से भरे पड़े हैं। यही कारण है कि इस वर्श सुविख्यात हास्य-आयोजन ‘घोंघाबसंत सम्मेलन’ में इन दोनों विभागों को पुनः ‘मूर्ख रत्न’ का ‘सम्मान’ दिया गया। प्रदेश के सभी महानगरों में विकास प्राधिकरणों का जन्म भ्रष्टाचार के लिए कुख्यात नगर निगमों की कोख से हुआ था, जो धीरे-धीरे स्वतंत्र इकाई के रूप में ऐसे विकसित हुए कि उनमें तैनाती के लिए बड़े-बड़े प्रयास होने लगे। विकास प्राधिकरणों का गठन इस उद्देश्य से हुआ था कि प्रदेश के महानगरों का सम्यक एवं आदर्श रूप में विकास किया जाय, लेकिन हुआ उसका उलटा। विकास प्राधिकरणों में तैनात तमाम लोग अपनी अगली कई पीढ़ियों को मालामाल करने में जुट गए। यदि विकास प्राधिकरणों में तैनात रहे लोगों की कभी निष्पक्ष जांच हो तो लूट के भयंकर खुलासे हो सकते हैं। परिणाम यह हुआ है कि प्रदेश के शहर अवैध निर्माणों से बुरी तरह भर गए हैं। पार्किंग की व्यवस्था हुए बिना शहरों में मार्केट एवं शोरूम खुलते जा रहे हैं, जिनके वाहन सड़कों को घेरकर खड़े होते हैं। भ्रष्ट सरकारों में तो इन प्राधिकरणों की पौबारह रहती ही है, किन्तु ईमानदार सरकार भी इनके आगे लाचार सिद्ध होती है। इसी से ईमानदार सरकार के समय में भी विकास प्राधिकरण का शायद ही कोई अफसर कभी नापा गया।     वैसे तो प्रदेश के सभी नगर निगमों का बुरा हाल है, किन्तु राजधानी लखनऊ का नगर निगम उनमें सबसे बड़ा उस्ताद माना जाता है। सौभाग्यवश इस समय प्रदेश के नगर विकास मंत्री सुरेश कुमार खन्ना हैं, जिनकी छवि बहुत अच्छी है तथा नगर आयुक्त डा. इंद्रमणि त्रिपाठी हैं, जो अधिकारियों की वर्तमान खेप में अतिश्रेष्ठ माने जाते हैं। पर दुर्भाग्यवश ये दोनों ही लोग लखनऊ नगर निगम का शुद्धिकरण करने में विफल हो गए हैं। डा. इंद्रमणि त्रिपाठी के साथ मजबूरी यह है कि इतने विशाल क्षेत्रफल वाले लखनऊ में हर ओर नजर रख पाना असंभव है। इसी से डा. इंद्रमणि त्रिपाठी अपनी चलताऊ सक्रियता ही दिखा पा रहे हैं। पूरी राजधानी अतिक्रमणों से पटती जा रही है, किन्तु उससे मुक्ति दिलाने वाला कोई नहीं है। लखनऊ नगर निगम स्वयं अतिक्रमणों का सबसे बड़ा संरक्षक बन गया है। वह अतिक्रमण हटाता नहीं है, बल्कि अतिक्रमण कराता है। अतिक्रमणों की शिकायत करने पर उसके अफसर पुलिस पर जिम्मेदार डालकर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं। दूसरी ओर पुलिस यह जिम्मेदारी नगर निगम पर डाल देती है। हकीकत में दोनों ही दोषी हैं। वे दोनों ही नाजायज वसूली से होने वाली भारी-भरकम आमदनी के लोभ में न केवल अतिक्रमण कराते हैं, बल्कि उसे हर तरह से संरक्षण प्रदान करते हैं। भ्रष्टाचार का मकड़जाल इतना तगड़ा है कि ईमानदार सरकारें व उसके मंत्री भी हथियार डाल देने को मजबूर हो जाते हैं।   लखनऊ में ऐसी अनगिनत सड़कें एवं पटरियां(फुटपाथ) हैं, जो अतिक्रमणों की भेंट चढ़ती जा रही हैं तथा धीरे-धीरे उनका अस्तित्व समाप्त हो रहा है। लखनऊ में बर्लिंग्टन चैराहे से उदयगंज चौराहे तक घरों के बारजों के नीचे पटरी थी, जिससे होकर लोग पैदल आया-जाया करते थे। धूप व बरसात में उससे बड़ी सुविधा रहती थी। घरों के नीचे बनी दुकानों ने धीरे-धीरे सम्पूर्ण पटरी पर कब्जा कर अपनी दुकानें आगे बढ़ा लीं तथा अब तो वहां पटरी का निशान ढूंढ़ पाना मुश्किल है। जब ये कब्जे हो रहे थे, उस समय लोगों ने लखनऊ नगर निगम के अधिकारियों से बहुत शिकायतें कीं, किन्तु घूसखोर अफसरों ने कोई कार्रवाई नहीं की। लखनऊ के नरही क्षेत्र में भी पटरियों पर इतने कब्जे हो रहे हैं कि वे समाप्तप्राय हैं। कई गलियां छेंककर बंद कर दी गई हैं। नरही क्षेत्र अतिक्रमणों से इतना भर गया है कि अब उन्हें हटा पाना बहुत कठिन है। लखनऊ के क्ले स्क्वायर आदि अन्य क्षेत्रों में भी पटरियों पर कब्जे होते जा रहे हैं। इसका एकमात्र उपाय अब यह है कि सभी सड़कों के किनारे पटरियों को बिलकुल समाप्त कर दिया जाय। डायमंड डेरी कालोनी में एक सड़क नेताजी सुभाष पार्क के बगल से होकर उदयगंज वाली मुख्य सड़क पर पूड़ी की दुकान तक थी। उस सड़क पर लोगों के घर बन गए तथा सड़क गायब हो गई। लखनऊ के चप्पे-चप्पे का यही हाल है। कभी-कभी अभियान चलाकर अतिक्रमण हटाने का नाटक किया जाता है, जिसके बाद नगर निगम के लोग व पुलिस वहां पर अतिक्रमणों की पुनः छूट दे देते हैं। लखनऊ में नजीराबाद में यदि दोनों ओर की अतिक्रमणगस्त पटरियां हटा दी जाएं तो वह सड़क इतनी चैड़ी हो सकती है कि उसे जाम से मुक्ति मिल जाय।      लखनऊ में कबीर मार्ग की भी ऐसी ही दुर्दशा है। उसकी पटरियों पर कई लोगों ने अपने आवासों की चारदीवारी आगे बढ़ाकर कब्जा कर लिया है तो किसी व्यवसायी ने अपने कर्मचारियों के लिए पटरी पर स्टैंड बना लिया है। कबीर मार्ग के बगल की एक गली एक व्यवसायी के आवास के पीछे है, जिस पर उसने कब्जा कर लिया है। कबीर मार्ग की सड़क जितनी चैड़ी है, उससे अधिक चैड़ी अगल-बगल पटरियां हैं, जिन पर धीरे-धीरे अतिक्रमण होते जा रहे हैं। पिछले कई वर्षों से कबीर मार्ग पर यातायात इतना बढ़ गया है कि उस पर प्रायः जाम लग जाता है। मैं अनेक वर्षों से इस प्रयास में लगा हुआ हूं कि कबीर मार्ग की नालियों को दोनों ओर मकानों के किनारे खिसका दिया जाय तथा वर्तमान पटरियों पर इंटरलाकिंग ईंटें बिछा दी जाएं। इससे किनारे पेड़ों को नहीं काटना पड़ेगा तथा सड़क की चौड़ाई बढ़ जाएगी। लेकिन स्वार्थी तत्वों एवं नगर निगम के भ्रष्ट लोगों का गठजोड़ ऐसा नहीं होने दे रहा है। बार-बार कबीर मार्ग का वर्तमान स्थिति में ही पुनर्निर्माण कराकर भारी धनराशि का वारा-न्यारा कर दिया जाता है। हाल में पर्दाफाश हुआ कि ऐसे ही कार्य के लिए पुनः लगभग 55 लाख रुपये की धनराशि स्वीकृत कर दी गई है। मैंने जब शासन का ध्यान इस ओर आकृष्ट किया तो वह काम रुका। किन्तु बार-बार भ्रष्ट तत्व दबाव डलवाकर काम शुरू करा देते और हर बार शासन से लिखा-पढ़ी कर मैं वह काम रुकवा देता। यह तर्क भी दिया जा रहा है कि बिजली के खम्भों को तुरंत हटाना संभव नहीं है। इसका उत्तर यह है कि बिजली के खम्भों को सड़क की चौड़ाई बढ़ाने के उपरांत बाद में भी हटाया जा सकता है। लखनऊ में डालीबाग में तिलक मार्ग तथा अन्य तमाम ऐसी सड़कें हैं, जहां सड़कें चौड़ी की जाने के बावजूद वहां पर बिजली के खम्भे अभी तक खिसकाकर किनारे नहीं किए गए हैं। लखनऊ नगर निगम इस तर्क की अनदेखी कर रहा है कि उसे व्यापक जनहित का ख्याल रखना चाहिए, न कि अतिक्रमणकारियों व अन्य स्वार्थी तत्वों के हित का। जनहित का तकाजा यह है कि अतिक्रमण हटाकर कबीर मार्ग को उस रूप में चौड़ा कर दिया जाय, जैसी लम्बे समय से उत्तर प्रदेश नागरिक परिषद द्वारा मांग की जा रही है।

X

सर्कल: लोकल न्यूज़ और वीडियो
अपने शहर का अपना ऐप

സർക്കിൾ: പ്രാദേശിക വാർത്തകളും വീഡിയോകളും

Circle: Local News & Videos

Install
App