शत्रुघ्न सिन्हा ; खामोश ***!

शुक्रवार को सपा मुखिया अखिलेश यादव मैनपुरी की जनसभा में कांग्रेस को सबसे बड़ी धोखेबाज़ पार्टी बताते हुए कोस रहे थे। उसी दिन लखनऊ में पटना साहिब से कांग्रेस के उम्मीदवार शत्रुघ्न सिन्हा लखनऊ की सपा उम्मीदवार के लिए समर्थन जुटा रहे थे।   शत्रुघ्न सिन्हा को लेकर कांग्रेस की लाचारी चौंकाने वाली हैं। लखनऊ में शत्रुघ्न की पत्नी पूनम सिन्हा सपा की उम्मीदवार हैं। वहां कांग्रेस के उम्मीदवार प्रमोद कृष्णम हैं। शत्रुघ्न लखनऊ में पति धर्म निभा रहे हैं। कांग्रेस पार्टी खामोश है। अकेले उसके उम्मीदवार प्रमोद कृष्णम बेबसी से पूछ रहे हैं। पति धर्म तो निभाया। पार्टी धर्म कब निभाएंगे ?    मोदी-शाह के दौर में किनारे लगे शत्रुघ्न लगातार पांच साल तक भाजपा और उसकी सरकार पर अपनी भड़ास निकालते रहे। कांग्रेस में दाखिले के बाद यह अध्याय बन्द हो चुका है। पर एक प्रसंग के कारण उसकी चर्चा होनी चाहिए। उन्होंने आडवाणी जी को अपना गुरु, मार्गदर्शक, फिलासफर और मित्र बताने का कोई मौका नही छोड़ा । तब यकीनन 2019 के चुनाव के मौके पर आडवाणी जी का इकलौता चर्चित ब्लॉग जरूर उनकी जानकारी में होगा। इस ब्लॉग में आडवाणी जी ने पहले देश, फिर पार्टी और आख़िर में खुद को रखा है। दिलचस्प है कि शत्रुघ्न ने गुरु-मित्र के उलट लाइन ली है। परिवार उनके लिए सबसे पहले है।    गुज़रे जमाने के दूसरी कतार के फिल्मी पर्दे के खलनायक शत्रुघ्न अपने बड़बोलेपन के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने खुद को कभी अमिताभ बच्चन से कमतर नही माना। भाजपा ने उन्हें राज्यसभा, लोकसभा पहुंचाया। बाजपेयी सरकार में मंत्री भी बनाया। पर बिहार का मुख्यमंत्री बनने की चाहत उनकी फिलहाल पूरी नही हो सकी है। वह लगातार मोदी और उनकी सरकार पर बरसते रहे। उनके व्यंग्य वाण भोथरे साबित हुए। फ़िल्मी शैली के उनके राजनीतिक डायलॉग्स संजीदगी के साथ सुने नही जाते । लालू की राजद में उनकी जगह नही बनी। बकौल खुद के लालू जी के कहने पर वह कांग्रेस में आये। कांग्रेस में दाखिल होते वक़्त उन्हें राहुल गांधी में देश का भविष्य नज़र आया। हफ़्ते के अंतराल पर लखनऊ में वह पत्नी पूनम सिन्हा की उम्मीदवारी के बहाने लखनऊ में थे। अब अगर अखिलेश यादव में देश का भविष्य नज़र आ रहा है, तो इसमें क्या अजूबा!      फिल्मी सितारे राजनीति की दुनिया में आम तौर पर भीड़ जुटाने के काम आते हैं। वैसे यह भीड़ वोटों में कम ही बदलती है। पर यह भीड़ उनके पैर जमीन पर टिकने नही देती। खुशफ़हमी भी पैदा करती है और ऐसे मौकों पर वे अपने को दलों से ऊपर मान लेते हैं। शत्रुघ्न किसी भी दल में रहें, खूब बोलते हैं। अपने मन की बोलते हैं। मन की करते हैं। मान कर चलते हैं। पार्टी की उन्हें नही। पार्टी को उनकी जरूरत है। उनकी या उन जैसों की सोच अकारण भी नही है। सपा उम्मीदवार पूनम सिन्हा की लखनऊ में क्या पहचान है ? वह शत्रुघ्न सिन्हा की पत्नी के नाते परिचित न कराई जाएं तो उन्हें वहां कौन जानेगा ? उधर अखिलेश यादव को भी पता है कि फ़िलवक्त जिस कांग्रेस पर उत्तर प्रदेश में वह बरस रहे हैं , उसी कांग्रेस के शत्रुघ्न पटना साहिब में उम्मीदवार हैं। पूनम सिन्हा को उम्मीदवार बनाते समय अखिलेश यादव को भी पता है कि लखनऊ में नाम पूनम का होगा चेहरा शत्रुघ्न का रहेगा, तभी कुछ काम बनेगा। बात बात में " समाजवादी लोग " " लोहिया के लोग " दोहराने वाले उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और सपा के मुखिया की मजबूरी देखिए! गठबंधन की सवारी। उस पर यह हाल। बनारस का अभी नम्बर ही नही और लखनऊ का सपाई चेहरा पटना के कांग्रेसी के बिना अधूरा। पार्टी के सवाल पर शत्रुघ्न कह चुके हैं कि वह इन सबसे ऊपर हैं। जब तक कांग्रेस नेतृत्व कोई ऐतराज नही करता तब तक शत्रुघ्न की इस बात पर यकीन किया जाना चाहिए कि उनका लखनऊ का प्रचार अभियान राहुल गांधी की जानकारी में है। वह इस हद तक आश्वस्त हैं कि खुद को पार्टी जैसी चीजों से ऊपर बता रहे हैं। सुनने वालों को इसमें उनका दम्भ दिख सकता है। शेख़ी भी। पर यह अकारण नही। वह जो बोल रहे हैं, उसकी ताकत उन्हें राजनीतिक दलों की कमजोरी से मिल रही हैं। देश-प्रदेश की सरकारें संभाल चुके और फिर से उसके दावेदार दल । नीतियों-सिद्धांतों की बातें करने वाले दल। जिनके पास पार्टी के लिए खपने-पसीना बहाने और टिकट मांगने वालों की कतार है। पर चुनाव के वक्त उन्हें सिर्फ़ भीड़ जुटाने। जीत का भरोसा दिलाने वाले चेहरे की तलाश रहती है। इस चेहरे  की हर शर्त कुबूल। इसीलिए तो शत्रुघ्न बात बात में अपना डायलॉग " खामोश*** दोहराते हैं!

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