दुनिया के लिए शिक्षा भी एक बड़ी चुनौती

सजग वह है जो शिक्षा को लेकर सतर्क है और शासन उस सरकार का अच्छा जिसकी प्राथमिकताओं में यह शुमार हो। सुशासन और शिक्षा का गहरा सम्बंध है। संरचना, प्रक्रिया और व्यवहार का संयोजन यदि बेहतर है तो शिक्षा बेहतर होगी, गुणवत्ता युक्त होगी और देश उन्नति की राह पर होगा। देश कोई भी हो शिक्षा देने के अपने-अपने प्रारूप हैं। भारत, चीन, पाकिस्तान व अमेरिका समेत सभी देशों में यह अलग-अलग है पर एक बात के लिए सभी में एकरूपता है कि अच्छी षिक्षा की दरकार सभी को है। इसी से अच्छे नागरिक के साथ अच्छे मानव संसाधन का संदर्भ निहित है। केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावेडकर का हालिया बयान कि उनके सरकार के कार्यकाल में शिक्षा पर होने वाला व्यय साल 2014 के जीडीपी के 3.8 फीसदी की तुलना में बढ़कर 4.6 प्रतिशत हो गया है और अब इसे 6 फीसदी का लक्ष्य देने की बात कह रहे हैं। इसके पहले कांग्रेस के मेनिफेस्टो में भी जीडीपी का 06 फीसदी खर्च करने की बात की गयी है। सम्भव है सरकार किसी की हो शिक्षा में सुधार के प्रति दोनों आतुर हैं। फिलहाल भारत में सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली काफी कमजोर मानी जाती रही है पर अब इसमें कुछ सुधार भी हुए हैं। खराब बुनियादी सुविधा से लेकर हजारों की तादाद में शिक्षकों के खाली पद और अप्रशिक्षित तथा शिक्षा के प्रति उदासीन शिक्षकों ने तो इसकी हालत और पस्त की है। कोठारी समिति कह चुकी है कि न्यूनतम 6 प्रतिशत जीडीपी का शिक्षा पर लागू किया जाना चाहिए जिस पर किसी सरकार ने इच्छाशक्ति अभी तक नहीं दिखाई। हालांकि चुनावी बेला में मानव संसाधन विकास मंत्री बड़ी बात बोल रहे हैं। बारहवीं पंचवर्षीय योजना की सिफारिश में भी शिक्षा में बजटीय आवंटन की कमी को लेकर कुछ वर्षों की पड़ताल देखी जा सकती है। सीएजी रिपोर्ट 2017 के अनुसार राज्य सरकारें 2010-2011 और 2015-2016 के बीच 21 से लेकर 41 प्रतिशत तक धन का उपयोग करने में असमर्थ रही। गुणवत्तापूर्वक शिक्षा प्रदान करने के मामले में भारत कहीं अधिक पीछे है। हालांकि दुनिया भर के पढ़े-लिखे और पेशेवर लोगों की जमात में अमेरिका का वर्चस्व भी कुछ घटा है। कोरिया और चीन जैसे देश इसमें अपना हिस्सा बढ़ा रहे हैं। आर्थिक सहयोग और विकास संगठन की सालाना रिपोर्ट से यह बात भी सामने आयी है कि चीन और कोरिया जैसे देश में कॉलेज की पढ़ाई और पेशेवर शिक्षा हासिल करने वाले लोगों की संख्या में तेजी से इजाफा हो रहा है। अमेरिका और जर्मनी को छोड़ दूसरे अन्य औद्योगिक देशों में भी स्थिति ऐसे ही बनते दिखती है। अमेरिका के लिए एक चेतावनी भी दी गयी थी कि 2020 तक कॉलेज ग्रेजुएट की संख्या में अपना सर्वोच्च स्थान बनाने के लिए उसे ठोस कदम उठाने ही पड़ेंगे। भारत की स्थिति यह है कि प्रतिवर्ष 3 करोड़ से अधिक यहां ग्रेजुएट होते हैं और 55 लाख के आस-पास पोस्ट ग्रेजुएट जबकि पीएचडी में नामांकन बहुत कम हो पाता है। इतना ही नहीं विद्यालय से लेकर महाविद्यालय और अधिकतर विश्वविद्यालय शिक्षा के मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने में असमर्थ देखे जा सकते हैं। उच्च शिक्षा में दुनिया भर के छात्रों के बीच जर्मनी के छात्रों की संख्या भी 50 सालों से करीब-करीब स्थिर है। कहा जाता है कि 50 साल पहले जर्मनी में हर पांचवां उच्च शिक्षा पाता था। अब हर चौथा व्यक्ति उच्च शिक्षा पाता है। तुलनात्मक खर्च के मामले में भी जर्मनी बहुत पीछे है। 1995 के दौर में जर्मनी शिक्षा पर जीडीपी का 5 फीसदी से अधिक खर्च करता था अब यह आंकड़ा गिरा हुआ है। मगर एक हकीकत यह है कि भारत में हर चौथा व्यक्ति अशिक्षित और इतना ही गरीबी रेखा के नीचे है। पढ़ाई हो या कमाई अमेरिका दुनिया का ध्यान आकर्षित करता है। अमेरिका की शिक्षा प्रणाली कितनी उपजाऊ है यह भी एक पड़ताल का विषय है। भारत के पब्लिक स्कूलों में समृद्ध परिवारों के बच्चों का प्रवेश दर अधिक होता है जबकि अमेरिका के सघन आबादी वाले शहरों में जो सरकारी स्कूल हैं उनमें अधिकतर साधारण वर्ग के बच्चे पढ़ते हैं। अमेरिका में एक नियम यह भी है कि बच्चे को निकटवर्ती स्कूल में ही भर्ती करवाना होगा जिस हेतु निःशुल्क बस सेवा, कई स्कूलों में सुबह का नाश्ता जैसी सुविधाएं भी उपलब्ध हैं। शिक्षा को शारीरिक और मानसिक पाठ्यक्रम को ध्यान में रख कर दिया जाता है। बच्चों को कोई समस्या न हो इसके लिए सहायक भी नियुक्त किये जाते हैं। स्कूल में उपचार के लिए नर्स भी होती है। बहुत से शिक्षक स्कूल में अतिरिक्त समय देते हैं। इतना ही नहीं किताबें, नोटबुक्स आदि की भी व्यवस्था उपलब्ध कर आभावग्रस्त बच्चों को इससे मुक्ति दिलाते हैं। इसके अलावा भी कई सकारात्मक संदर्भ से युक्त यहां की व्यवस्था देखी जाती है। अमेरिका के बाकी हिस्सों में सबसे उन्नत शिक्षा प्रणाली है। राज्य और स्थानीय सरकार पाठ्यक्रम तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। राज्य शिक्षा पर बहुत अधिक नियंत्रण लेता है। एक दशक पहले ऐसा भी रहा है कि भारत में विश्वस्तरीय शिक्षा नहीं मिल सकती है पर अब ऐसा नहीं है। भले ही कुल जीडीपी का शिक्षा पर खर्च कम लग रहा हो पर प्रवृत्ति ने शिक्षा की गुणवत्ता को बड़ा किया है। पाठ्यक्रमों में भी परिवर्तन किया गया है परन्तु यह समझ पाना भी मुश्किल हो रहा है कि उक्त बदलाव पूरी तरह प्रासंगिक है या नहीं। पड़ोसी चीन पर दृष्टि डालें तो बच्चों की पढ़ाई की शुरूआत वहां 6 साल से होती है। यहां ग्रेड 1 में 6 साल की उम्र में जो प्राइमरी शिक्षा का भाग होता है और यह एक से 6 ग्रेड तक होती है। इसी तरह जूनियर सेकेण्डरी 7 से 9 ग्रेड तक पढ़ाई जो 15 साल की उम्र में इसे पूरा करते हैं। तत्पश्चात् सेकेण्डरी एजुकेशन होती है जिसमें 10 तक की पढ़ाई करवाई जाती है। उसके बाद पोस्ट सेकेण्डरी जो 14वीं ग्रेड तक और अन्ततः ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट की पढ़ाई होती है। चीन के स्कूलों में बच्चों को दिन में दो बार वार्म-अप करना होता है जबकि भारत में एक बार ही वार्म-अप करवाया जाता है। बच्चों को खाना खाने के लिए एक घण्टे का टाइम दिया जाता है। कुछ स्कूलों में तो बच्चों को सोने की भी इजाजत है। चीन में पढ़ने वाले बच्चें स्कूल में नींद ले सकते हैं इसे कोई नैतिक गिरावट नहीं मानी जाती। हालांकि यहां 8 बजे से 4 बजे तक के स्कूल होते हैं लेकिन इसका यह तात्पर्य नहीं कि केवल पढ़ाई होती है अन्य क्रियाकलाप के कारण यह समय बढ़ा है। यहां भी सरकारी और प्राइवेट स्कूल पाये जाते हैं और फीस में मोटा अंतर देखा जा सकता है। दूसरे पड़ोसी पाकिस्तान की स्थिति पर भी दृष्टि डाली जाय तो यहां ढाई करोड़ से अधिक बच्चे स्कूल ही नहीं जा पाते जिनमें लड़कियों की संख्या अधिक है। जुलाई 2018 के पाकिस्तान के चुनावी घोषणापत्रों में भी यह बात कही गयी कि सवा दो करोड़ बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे हैं। छठी कक्षा आते-आते करीब 60 फीसदी लड़कियां स्कूल से बाहर हो जाती हैं और 9 कक्षा आते -आते 13 फीसदी ही शिक्षा जारी रख पाती हैं। पाकिस्तान इन दिनों कई समस्याओं से जूझता दिखता है यह अपने जीडीपी का 2.8 फीसदी ही शिक्षा पर खर्च कर पाता है जबकि भारत एशियाई और ब्रिक्स देशों से ज्यादा खर्च शिक्षा पर करता है। सब के बावजूद दो टूक यह है कि शिक्षा पर न केवल धन का व्यापक आवंटन करना है बल्कि पाठ्यक्रम को भी समय और परिस्थिति के अनुकूल ढलान देना है। दुनिया में विभिन्न प्रकार की प्रतियोगिता बढ़ी है उससे पार पाने के लिए षिक्षा रूपी हथियार को मजबूत होना ही पड़ेगा।(लेखक निदेशक, वाईएस रिसर्च फॉउन्डेशन ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन हैं।)

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