दो गोल ; दोनों अपने गोल में

 दो गोल। दोनों अपने ही गोल पोस्ट में । पहले बनारस की उम्मीदवारी को लेकर । अब अपने ' हल्के' उम्मीदवारों के वोट काटने के सवाल पर । प्रियंका गांधी वाड्रा गांधी परिवार का ' ट्रम्प कार्ड ' मानी जाती रही है। उत्साही समर्थक उन्हें ' ब्रह्मास्त्र ' भी मानते हैं। अर्से से उन्हें लेकर लोगों में उत्सुकता थी। मीडिया और राजनीतिकों के बीच खासतौर पर। 2019 के रण में वह विरोधियों के मुकाबिल हैं। विरोधी कौन हैं ? भाजपा को लेकर तो कोई दुविधा नही है। सपा-बसपा को लेकर असमंजस है। इन दोनों दलों ने उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को गठबंधन लायक नही माना। कांग्रेस अकेले लड़ने को मजबूर हुई। सपा-बसपा ने कांग्रेस के लिए रायबरेली और अमेठी सीटें छोड़ीं। कांग्रेस ने आभार में सात सीटें खाली कर दीं। मायावती लगातार तो अखिलेश यादव गाहे-बगाहे कांग्रेस पर हमले करते रहते हैं। दूसरी तरफ़ कांग्रेस उनसे लड़ भी रही है और लड़ते दिखना भी नही चाहती। चुनाव बाद के सम्भावित गठबंधन की फिक्र में चुनाव बीच अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी जा रही है।   बुधवार को अमेठी में प्रियंका के बयान पर गौर कीजिए। " हमारे उम्मीदवार जहां मजबूत हैं। वे मजबूती से लड़ रहे हैं । वे जीतेंगे लेकिन जहां हमारे उम्मीदवार हल्के हैं, वहां वे गठबंधन नही भाजपा के वोट काट रहे हैं।"  प्रियंका किसका मनोबल बढ़ा रही हैं ? मतदाताओं को क्या संदेश दे रही हैं ? मतदान के लिए शेष अमेठी, रायबरेली के अलावा कितनी सीटें हैं, जहां कांग्रेस मजबूती से लड़ रही है ? ये संख्या दहाई में तो नही है। फिर नेता की ही निगाह में उसके उम्मीदवारों की भूमिका वोट काटने तक सीमित हो जाये तो मतदाता कौन सी राह पकड़ेंगे? ऐसे मतदाता अपना वोट क्यों ख़राब करना चाहेंगे ? विकल्प खुद क्यों नही तय करना चाहेंगे ?     दिलचस्प यह है कि प्रियंका का यह बयान उस वक्त आया जब कांग्रेस पर बरसती मायावती मध्यप्रदेश में कांग्रेस सरकार से समर्थन वापसी की चेतावनी दे रही थीं। नाराज अखिलेश कह रहे थे, " कांग्रेस ने हमारे पीछे सी बी आई और ई डी लगाई। हमारा बड़ा दिल देखिये । फिर भी हमने उनसे गठबंधन किया। जिसके कारण हमारे पीछे सी बी आई लगी थी वह कांग्रेस प्रत्याशी के नामांकन में आया था। इसलिए कांग्रेस हमे राजनीति न सिखाये।" भाई -बहन राहुल-प्रियंका के बीच की बेहतर केमेस्ट्री चुनाव अभियान में बिखरती दिख रही है। प्रियंका के बनारस से लड़ने के सवाल पर भी । सपा-बसपा को लेकर भी। अमेठी में प्रियंका गठबंधन को कांग्रेस से नुक़सान न होने की तसल्ली दे रही थीं । उधर बगल बाराबंकी में राहुल गांधी कह रहे थे , " आज तक सपा और बसपा के नेता मोदी के खिलाफ़ खड़े होने और बोलने की हिम्मत नही कर पाए। क्योंकि मायावती और अखिलेश का कंट्रोल मोदी के पास है। इन दोनों की हिस्ट्री उनके पास है। मेरी कोई हिस्ट्री नही। मैं मोदी से नही डरता।"  उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की कमजोरी को राहुल गांधी भी कुबूल करते रहे हैं। तीन महीने पहले अगले तीन साल यानी 2022 की तैयारी को लेकर प्रियंका को मैदान में उतारा गया है। बेशक प्रियंका को 2019 के चुनाव के लिहाज से बहुत कम वक़्त मिला है। पर जब आप किसी इम्तेहान में शामिल होते हैं तो नतीज़े को परखते समय तैयारी के कम वक़्त की सफ़ाई काम नही आती। ज्यादा जोर देने पर जबाब मिलता है कि तैयारी के बाद ही इम्तेहान देते! पर चुनावी इम्तेहान में सिर्फ वोटों की गिनती के बाद के नतीज़े मायने नही रखते। वहां एक बड़ा इम्तेहान प्रचार अभियान के दौरान रोज चलता रहता है। जिनके बाजुओं पर जितनी बड़ी जिम्मेदारी उनका उतना बड़ा इम्तेहान।  राहुल अकेले काफ़ी नही समझे गए, इसलिए प्रियंका आगे आईं। वह भीड़ खींचती हैं। उत्सुकता जगाती हैं। उन्हें राहुल से बेहतर माना जाता है। उनमें इंदिरा जी की झलक देखी जाती है। सधा बोलती हैं। लोगों से जल्दी जुड़ती और जोड़ती हैं। पार्टी ही नही उससे बाहर भी उनमें एक नेता के तौर पर बेहतर संभावनाएं देखी जाती हैं। वह पहली बार अमेठी-रायबरेली से आगे निकली हैं। लेकिन इसके साथ ही उनके बयानों- फैसलों पर सवाल भी खड़े होने लगे हैं। बनारस से नरेंद्र मोदी के खिलाफ़ लड़ने की चर्चा खुद उन्होंने शुरु की थी। बाद में उन्होंने जोड़ा था कि पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी अनुमति देंगे तब लड़ूंगी । बयान से पहले क्या उन्होंने इस सवाल पर राहुल के रुख को जानना जरूरी नही समझा ? या फ़िर भाई की रजामंदी से वह बोलीं लेकिन खिलाफ़ नतीजों की आशंका में पैर खींचने पड़े ? अब वह सफ़ाई दे रही है कि चूंकि उन पर पूर्वी उत्तर प्रदेश के सभी प्रत्याशियों की जिम्मेदारी है और चुनाव लड़ने पर वह एक सीट तक सिमट जातीं, इसलिए चुनाव न लड़ने का फैसला लिया। पर यह जिम्मेदारी तो उनके राजनीति में प्रवेश के साथ ही आ चुकी थी ! तीन चरणों के चुनाव बाकी हैं। इन चरणों में उत्तर प्रदेश की वह सीटें हैं, जिनकी उन पर सीधी जिम्मेदारी है। और उसी मुकाम पर वह पहली बार अपने " हल्के उम्मीदवारों " का जिक्र कर रही हैं। उनके नाम उन्होंने नही बताए और गिनाए ? लेकिन प्रतिद्वन्दी याद दिलाएंगे। मतदाता पहचान लेंगे। उन्हें भारी बनाने की मेहनत और हौसले की जगह प्रियंका सपा-बसपा को तसल्ली दे रही हैं। क्या ?" ऐसे उम्मीदवार नुकसान गठबंधन का नही, भाजपा का करेंगे ।" 23 मई की गिनती नफ़े-नुकसान को अंतिम रूप से तय करेंगी। पर पहले बनारस के रण की ओर बढ़ और फिर वापस होकर । और अब अपने ही उम्मीदवारों को कमजोर बता , वह अपना और पार्टी दोनों का नुक़सान कर चुकी हैं।

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