शीतला सिंह जी साथ

सिर चढ़ा सूरज। तापमान 40 डिग्री। आदरणीय शीतला सिंह जी का फोन था। आ रहा हूँ। दस मिनट के भीतर साथ थे। 1932 में जन्मे शीतला जी लोकसभा चुनाव के अब तक के सम्पन्न चरणों की उत्तर प्रदेश की लगभग सभी सीटों पर घूमकर वहां की नब्ज टटोल चुके हैं। रविवार को सुल्तानपुर की उनकी यात्रा उसी कड़ी में थी। उम्र के 87 वें बसंत में उनकी कर्मठता-सक्रियता के आगे पत्रकारों की बाद की पीढियां मस्तक झुकाती हैं।    60 साल से ' जनमोर्चा ' के जरिये सत्य के पक्ष में अड़ने-लड़ने वाले शीतला जी ने पत्रकारों की पीढ़ियों को शिक्षित-संस्कारित किया है। उम्र की बाध्यताओं को वह ठेंगा दिखाते हैं। खूब पढ़ते हैं। घूमते हैं। लोगों से मिलते और संवाद करते हैं। जानकारी को परखते-तोलते हैं। फिर लिखते हैं। देश की तमाम पत्र-पत्रिकाएं और फीचर एजेंसियां उनसे निरंतर लिखाती और उन्हें छापती हैं । वे भरोसे और गौर से पढ़े जाते हैं.    वह प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के तीन बार सदस्य रहे। देश के लगभग हर हिस्से नगर - महानगरों ने उनकी सक्रिय बौद्धिक उपस्थित का ताप पाया। रूस, कोरिया, ब्रिटेन , फ्रांस, हॉलैंड, बेल्जियम, पोलैंड जर्मनी, चेकोस्लोवाकिया, बांग्लादेश, नेपाल आदि की उन्होंने वैचारिक- सांस्कृतिक यात्राएं की हैं । उत्तर प्रदेश श्रमजीवी पत्रकार संघ और हिंदी समाचार पत्र सम्मेलन तथा अखिल भारतीय भाषायी समाचारपत्र संगठन के अध्यक्ष रह चुके हैं। श्रेष्ठ पत्रकारिता केलिए उन्हें 25 से अधिक सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। प्रदेश सरकार ने यश भारती सम्मान से भी अलंकृत किया है। तमाम मोर्चों-मार्चों-अधिवेशनों-गोष्ठियों-सभा-सम्मेलनों में उनकी अग्रणी भूमिका रही है।    वाम-सोच से जुड़े शीतला जी सिर्फ़ पत्रकार नही। एक ऐसे बुद्धिजीवी जो सहयोग-सौहार्द और समन्वय की सोच को सच में बदलने के लिए निरन्तर यत्नशील रहे हैं। अयोध्या विवाद को हल कराने की उनकी कोशिशें खूब चर्चित रही हैं। अयोध्या आंदोलन के दौरान भावनाओं के ज्वार में जब तमाम अखबार विचलन की चपेट में आये, तब भी उनकी अगुवाई में 'जनमोर्चा ' की मशाल तथ्य-सत्य से प्रज्जवलित थी। उनकी पुस्तक " अयोध्या - रामजन्मभूमि -बाबरी-मस्जिद का सच " की खूब चर्चा है। उनसे असहमति रखने वाले भी उनका सम्मान करते और उन्हें पढ़ते-सुनते हैं। पत्रकारिता से जुड़े वे लोग जिन्होंने अपने को " पूर्ण " नही मान लिया है, उनके लिए आदरणीय शीतला जी का सानिध्य सुखद और प्रेरक है। पत्रकारिता के मुझ जैसे विद्यार्थी तो उनसे लगातार सीखते हैं। वह सिर्फ़ उम्र में बड़े नही हैं। सोच में उससे भी खूब बड़े। कभी नही भूलते।

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