ऐतिहासिक किला के पोखरा की इस स्थिति का जिम्मेदार कौन

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एक तरफ तो हम सभी जल संरक्षण और ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण पोखरों और तालाबों की सफाई और पवित्रता की बात करते हैं तो दूसरी तरफ यह भी सच है कि यह सारी चीजे कागजों में सरकारी फाइलों में दबी की दबी रह जाती है। सिकंदरपुर में स्थित ऐतिहासिक प्रसिद्ध किला का पोखरा जो अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए लगातार संघर्ष कर रहा है तथा विलुप्त होने के कगार पर पहुंच गया है। इस समय यह पोखरा पूरी तरह से सूख गया है जिसमें बच्चे क्रिकेट खेलते नजर आ रहे हैं। इसकी स्थिति को देखकर मशहूर शायर की एक शायरी याद आ रही है कि "पल-पल मरता जा रहा हूं तेरे शहर में, इससे भी बड़ी और सजा क्या दोगे मैं पूछ रहा हूं, अभी भी बचा लो मुझमें कोई दीपक नहीं जो फिर जला दोगे" सदियों पूर्व बादशाह सिकंदर लोदी ने अपने जमाने में यहां किले के निर्माण के समय इस पोखरे की खुदाई कराई थी। पोखरे की खुदाई का उद्देश्य यह था कि किला में निवास करने वाले बादशाह के फौजियों और अन्य कर्मचारियों को स्नान ध्यान के लिए पानी की उपलब्धता रह सके। खुदाई के समय ही पोखरा के पश्चिम तरफ बहुत ही खूबसूरत सिढ़ियां निर्मित की गई थी। जिनपर बैठकर नहाने की व्यवस्था थी। जैसे ही सिकंदर लोदी की बादशाहत खत्म हुई उसके बाद नगर की आम जनता को स्नान करने का अच्छा साधन उपलब्ध हो गया। धीरे धीरे पोखर पर भीड़ बढ़ने लगी। अब हालत यह था कि सुबह से देर शाम तक स्नानार्थियों की भीड़ के कारण वह काफी गुलजार रहता था। यह स्थिति लगातार एक सदी तक बनी रही। फिर बाद में हैंडपंप कल्चर के प्रादुर्भाव से पोखरा में नहाने वालों की संख्या दिन-प्रतिदिन कम होती गई। इस दौरान सफाई के अभाव में यह गंदा होने लगा। इसके चलते लोगों ने उसमें नहाना छोड़ दिया। आसपास रहनेवाले किनारों से कब्जा भी करने लगे इससे पोखरे का दायरा भी क्रम से घटता जा रहा है। यही नहीं मरम्मत के अभाव में पोखरे की सिढ़िया जर्जर हो गई है। जिनका जीर्णोद्धार द्वार भले ही देर से सही पर पूर्व नगर पंचायत चेयरमैन के प्रतिनिधि संजय जायसवाल की पहल पर कराया गया। वैसे वर्तमान में पोखरे का पानी धीरे-धीरे काला पड़ते-पड़ते सुख गया परंतु अभी तक जिम्मेदार व्यक्तियों की नजर इस पोखरे पर नहीं पड़ी। जिसकी वजह से यह पोखरा पूरी तरह से धूल फांक रहा है। जो पोखरा सिकंदरपुर की शान हुआ करता था अब उस पोखरे में सुबह शाम बच्चे क्रिकेट और फुटबॉल खेल के समय व्यतीत कर रहे हैं। अब प्रश्न यह उठता है कि क्या वास्तव में आज हम इसे ऐतिहासिक धरोहर के रूप में देखते हैं? अगर हां तो इसे बचाने के लिए हम नागरिकों ने और नेताओं ने कितने धरने प्रदर्शन किया और प्रशासन ने क्या कदम उठाए। शायद ही कोई इसका जवाब दे पाए। आज ऐसे व्यक्ति ऐसे संगठनों की जरूरत है जो इस ऐतिहासिक धरोहर के अस्तित्व को बचाने के लिए अग्रसर होकर प्रयास कर सके। वह इस गंदगी के खिलाफ लड़ सके साथ ही पोखरे की सफाई करा जल संरक्षण के लिए लोगों को प्रेरित कर सके।

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