स्वर्णनगरी के पत्थर व्यवसाय पर संकट के बादल, 50 फीसदी घटी पीले पत्थर डिमांड

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देश-दुनिया मैं सुनहरी आभा से विशिष्ट पहचान बना चुका स्वर्णनगरी का पीला पत्थर अब चमक होता दिखाई दे रहा है। हर वर्ष करीब 50 करोड़ का टर्न ओवर करने वाली जैसलमेर के पत्थर उद्योग पर मंडरा रहे संकट के कारण सैकड़ों लोगों के लिए रोजी-रोटी छीनने का खतरा उत्पन्न हो गया, इसकी मांग भी 50 फीसदी घट गई है प्रोत्साहन की कमी से यह निराशाजनक स्थिति बनी हुई है। जैसलमेर की रीको औद्योगिक क्षेत्र में इन दिनों मशीनें खामोशी दिखाई दे रही है वहीं कई श्रमिक बेघर हो गए हैं जब हमने मामले की पड़ताल की तो यह बात सामने आई कि उद्यमियों और श्रमिकों के अलावा खदानों भवन निर्माण का कार्य करने वाले मजदूरों कर्मिको व ढुलाई करने वालों का रोजगार भी संकट में यह संख्या करीब पांच हजार है। जानकार बताते हैं वर्ष 2011 के बाद से जैसलमेर में पत्थर की खान आवंटित नहीं की गई वहीं अब मकान या भवनों में पीले पत्थरों का उपयोग भी घटा है। जैसलमेर के रीको क्षेत्र में वहां इक्का-दुक्का स्थानों को छोडक़र अन्य किसी पत्थर फैक्ट्री में मशीन चालू नजर नहीं आई। श्रमिकों की संख्या भी कम दिखी। जानकारी लेने पर पता चला कि जैसलमेरी मार्बल की बिक्री पूर्णतया बंद है। जिन उद्यमियों के यहां रॉ मैटेरियल के तौर पर मार्बल के ब्लॉक्स पड़े हैं, वे उनकी कटाई करवाकर श्रमिकों को किसी तरह से रोजगार दे रहे हैं। उद्यमियों ने बताया कि ऐसा वे ज्यादा दिनों तक नहीं कर पाएंगे। उद्यमियों और श्रमिकों के अलावा खदानों, भवन निर्माण का कार्य करने वाले मजदूरों-कारीगरों व ढुलाई करने वालों का रोजगार भी संकट में है। यह संख्या लगभग पांच हजार है।इतने परिवार सीधे तौर पर पत्थर व्यवसाय से संबद्ध है, अप्रत्यक्ष जुड़े लोगों की संख्या भी कम नहीं है। रीको औद्योगिक क्षेत्र में 25-30 गैंगसा की बजाय वर्तमान में बमुश्किल 8 से 10 इकाया ही चल रही है। शेष गैंगसा इकाइयां बंद पड़ी है ऐसे ही यहां ब्लॉक कटिंग के लिए लगभग 120 कट्टर लगे हुए हैं। जिस व्यवसाय में कभी तीन शिफ्ट में काम होता था आज वहां एक से ही काम चल रहा है करीब 50 कटर ही कार्यरत है। पत्थर व्यवसायियों का कहना है कि जैसलमेर का पत्थर वयवसाय आर्थिक दूरी कहा जाता है।जानकारी के अनुसार रिक्टिफाइडटाइल्स और सिरेमिक्स से जैसलमेर के पत्थर को बड़ी चुनौती मिल रही है। मांग पहले की तुलना में खासी गिर चुकी है। ऐसे ही बीते महीनों के दौरान पर्यावरण स्वीकृति के चक्कर में पत्थर इकाइयां करीब चार माह तक झटके खा चुकी हैं।जैसलमेर जिले के सिपला, मूलसागर, सत्ता, काहला, चूंधी, जियाई, मूंदड़ी, अमरसागर में मार्बल तथा पिथला, बड़ाबाग, जेठवाई, चाहड़ू, पोहड़ा, हड्डा, बरमसर आदि में सेंड स्टोन और सांकड़ा, सनावड़ा, लखा, भाडली, मंगलसिंह की ढाणी आदि में ग्रेनाइट पत्थर निकलता है। खनन के दौरान पत्थर गहराई में नहीं मिल रहा है, वहां ऊपरी सतह पर ही है। पर्यावरणीय स्वीकृति को लेकर नियम का सरलीकरण हुआ लेकिन राज्य स्तर पर फिर से लागू। स्वीकृति लेने में से 3 से 4 महीने का लग रहा समय प्रक्रिया में आ रहा काफी खर्च।

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