चलो चलें कुंभः नागाओं के हठयोग का रहस्य

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किसी भी साधू संत महात्मा अथवा नागा साधुओं की बस एक ही कामना होती है मोक्ष प्राप्ति की.. मोक्ष प्राप्ति हेतु कोई हिमालय पर जाकर तप करता है तो कोई श्मशान में जाकर अघोर तंत्र मंत्र.. तो वहीं कुछ नागा साधू हठयोग करते हैं..भगवान शिव को प्राप्त करने के लिए इन नागाओं द्वारा अजीबो गरीब परिस्थितियों में अपने शरीर को रखकर स्वयं को अनंत पीड़ा देकर योग करते हैं.सामान्य रूप से हठयोग का अर्थ व्यक्ति द्वारा जिदपूर्वक हठपूर्वक किए जाने वाले अभ्यास से है अर्थात किसी अभ्यास को जबरदस्ती करने के अर्थ में हठयोग जिदपूर्वक जबरदस्ती की जाने वाली क्रिया है. हठयोग शब्द पर अगर विचार करें तो दो शब्द हमारे सामने आते है ह और ठ.  ह का अर्थ है- हकार अर्थात सूर्य नाडी।(पिंगला)  ठ का अर्थ है- ठकार अर्थात चन्द्र नाडी।(इडा)हठयोग के इसी हकार तथा ठकार शब्द को संस्कृत शब्दार्थ कौस्तुभ ने भी स्वीकार किया है. भलई हठयोग के परिप्रेक्ष्य में यह अवश्य प्रतीत होता है कि हठपूर्वक (जिदपूर्वक) की जाने वाली क्रिया हठयोग है. परन्तु स्पष्ट है कि हठयोग की क्रिया एक उचित तथा श्रेष्ठ मार्गदर्शन में की जाये तो साधक सहजतापूर्वक इसे कर सकता है. एक सहनशील, परिश्रमी, जिज्ञासु और तपस्वी व्यक्ति ही इस साधना को कर सकता है. इससे गृहस्थ लोग भी अपने शरीर, मन, इंद्रियों व प्राणों को स्वस्थ कर अध्यात्म की ओर बढ़ सकते है. इसके सात अंग बताय गए है- षट्कर्म, आसन, मुद्रा, प्रत्याहार, प्राणायाम, ध्यान, और समाधि. षट्कर्म शरीर का शोधन करते है, आसन से मजबूती आती है, मुद्राओं से स्थिरता, प्रत्याहार से धैर्य, प्राणायाम से हल्कापन, ध्यान से आत्मसाक्षात्कार व समाधि से साधक मुक्ति भाव में रहता है.इन नागाओं का मानना है कि भगवान शिव को वो किसी भी हद तक जाकर प्राप्त करना चाहते हैं चाहे उन्हें किसी भी परिस्थितियों का सामना करना पड़े. ऐसे ही कुछ नागाओं के बारे में हम आज आपको बताएंगे. जिसमें नागा साधू किस प्रकार से भगवान शिव को पाने का प्रयास कर रहे हैं..

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