महबूबा को घेरा नहीं रजत शर्मा ने

देशद्रोही तत्व बड़े शातिर दिमाग भी होते हैं। रजत शर्मा के ‘आप की अदालत’ में महबूबा मुफ्ती ने वैसा ही शातिर रूप दिखाया, जैसा कुछ समय पूर्व उक्त कार्यक्रम में कुख्यात असदउद्दीन उवैसी ने दिखाया था। अंतर सिर्फ इतना था कि उवैसी रजत शर्मा पर इस बुरी तरह हावी हुआ था कि उन्हें कुछ बोलने नहीं दे रहा था, जबकि महबूबा मुफ्ती रजत शर्मा पर उस तरह हावी नहीं हो पाई। रजत शर्मा ने महबूबा मुफ्ती से हर तरह के सवाल किए, किन्तु महबूबा की अनेक बातों की काट जिन तर्को द्वारा की जा सकती थी, वैसा नहीं कर पाए। ऐसा लगा कि रजत शर्मा ने इसके लिए उस तरह की तैयारी नहीं की थी, जैसी प्रायः किया करते हैं। अन्यथा महबूबा मुफ्ती के अनेक कथनों की सटीक काट की जा सकती थी तथा महबूबा ने बीच-बीच में अपनी उदारता वाला जो ढोंग किया और झूठ बोलीं, उनका भी पूरा पर्दाफाश किया जा सकता था। महबूबा मुफ्ती शुरू से अंत तक केवल यह रट लगाए रहीं कि भारत को पाकिस्तान से बात करनी चाहिए। पाकिस्तान को सबक सिखाने वाले स्टैंड को उन्होंने पूरी तरह खारिज कर दिया। वह बार-बार यह भय भी दिखाती रहीं कि भारत और पाकिस्तान आणविक शक्ति से युक्त देश है, इसलिए उनके बीच युद्ध नहीं, बल्कि बातचीत ही एकमात्र रास्ता है।           रजत शर्मा ने यदि उदाहरणों एवं आंकड़ों के साथ पर्याप्त तैयारी की होती तो महबूबा मुफ्ती के इस बातचीत वाले तर्क की पूरी तरह धज्जी उड़ाई जा सकती थी। रजत शर्मा से अधिक सटीक सवाल तो वहां मौजूद लोगों ने इन शब्दों में पूछा कि अब तक पाकिस्तान के साथ भारत ने जो वार्ताएं कीं, उनसे समस्या का समाधान नहीं निकला तो अब कैसे निकल सकता है? एक छात्रा ने यह सारगर्भित प्रश्न किया कि भारत-पाकिस्तान के बीच जितने युद्ध हुए हैं, उनसे कई गुना अधिक वार्ताएं हुईं, किन्तु कोई नतीजा नहीं निकला। फिर भी महबूबा मुफ्ती दोनों देशों के बीच वार्ता की ही रट लगाए रहीं। महबूबा मुफ्ती ने उदाहरण दिया कि 1947 के बाद भारत का पाकिस्तान के साथ जब भी युद्ध हुआ, उसके बाद भारत को पाकिस्तान के साथ वार्ता करनी पड़ी। यहां योग्य पत्रकार के रूप में रजत शर्मा को यह बताना चाहिए था कि उन वार्ताओं के कारण ही भारत ने युद्ध में मिली अपनी उपलब्धियों को गंवा दिया।           वास्तविकता यह है कि आजादी के बाद जवाहरलाल नेहरू ने अपनी नीतियों से देश को इतना अधिक कमजोर कर डाला था कि विश्व में उसकी ‘लाचार’ व ‘बेचारा’ वाली छवि बन गई थी। नेहरू की उसी नीति का आगे भी अनुसरण किया गया, जिससे देश का भीषण नुकसान हुआ। कश्मीर-समस्या नेहरू के कारण ही उत्पन्न हुई। सरदार पटेल ने अपनी योग्यता एवं विवेक से पौने छह सौ रियासतों का भारत में विलय कर लिया था। जवाहरलाल नेहरू ने जिद कर कश्मीर के विलय का मामला अपने हाथ में रखा था और अपनी मूर्खता से उसे ‘कैंसर समस्या’ बना डाला। जवाहरलाल नेहरू ने भारत का सिर्फ इतना ही नहीं अहित किया, बल्कि कश्मीर मामले को स्वयं संयुक्त राष्ट्र में ले गए तथा भारत में जम्मू-कश्मीर के विलय को अस्वीकार करते हुए कहा कि विलय के प्रश्न पर संयुक्त राष्ट्र की निगरानी में कश्मीर में जनमत-संग्रह कराया जाय। इस प्रकार नेहरू के मूर्खतापूर्ण एवं देशद्रोही चरित्र के कारण कश्मीर-समस्या उत्पन्न हुई, जिसे हम अब तक झेल रहे हैं। अन्यथा उस लड़ाई में ही पाकिस्तान का इलाज हो गया होता और आज वह हमारे लिए सिरदर्द नहीं होता।  वर्ष 1965 में प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने पाकिस्तान से युद्ध में सेना को छूट दी तो हमारी सेना लाहौर तक कब्जा कर सकने की स्थिति में हो गई थी। लेकिन जवाहरलाल नेहरू की देशद्रोही नीतियों से देश कमजोर हो चुका था तथा रूस का अंधानुकरण भी घातक हुआ था। रूस के दबाव में लालबहादुर शास्त्री को ‘ताशकंद समझौता’ करना पड़ा, जिसमें युद्ध में जीती हुई जमीन भारत को गंवा देनी पड़ी। उसी समय शास्त्री जी की हत्या भी कर दी गई, जिसके बारे में चर्चा थी कि उसमें इंदिरा गांधी का हाथ था। 1971 के युद्ध में जब बंगलादेश अस्तित्व में आया, उसी समय पाकिस्तान का पूरा इलाज हो जाता, लेकिन इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान के साथ मूर्खतापूर्ण ‘शिमला समझौता’ कर लिया, जिसके परिणामस्वरूप भारत ने बंदी बनाए गए एक लाख पाकिस्तानी सैनिक कश्मीर का पाकिस्तान-अधिकृत हिस्सा वापस लिए बिना पाकिस्तान को वापस कर दिए। अतः महबूबा मुफ्ती का यह कथन निराधार है कि बार-बार युद्ध होने के बावजूद पाकिस्तान के साथ समस्या हल नहीं हुई। समस्या तो उस प्रत्येक लड़ाई में ही हल हो गई होती, लेकिन अपनी मूर्खता व कमजोरी के कारण हमने हर बार उपयुक्त अवसर गंवा दिया।     महबूबा मुफ्ती ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान की प्रशंसा करते हुए कहा कि भारत को उन्हें मौका देना चाहिए और आतंकवादी हमले का सबूत देकर उनसे बातचीत करनी चाहिए। रजत शर्मा को महबूबा मुफ्ती से कहना चाहिए था कि जब पाकिस्तान में जैश-ए-मुहम्मद के मुखिया ने खुद स्वीकार किया है कि उसने पुलवामा-हमला करवाया तो दूसरे किसी सबूत की क्या आवश्कता है? इसी प्रकार महबूबा मुफ्ती ने यह बात कही कि पाकिस्तान के साथ विश्व के तमाम देश हैं और भारत अलग-थलग पड़ा हुआ है तो रजत शर्मा को समुचित आंकड़े देकर वास्तविकता बतानी चाहिए थी कि किन-किन देशों ने भारत का समर्थन किया है और पाकिस्तान की निंदा की है। रजत शर्मा ने बताने की चेष्टा तो की, लेकिन सही ढंग से नहीं स्पष्ट कर पाए।  महबूबा मुफ्ती एवं उनके पिता मुफ्ती मुहम्मद सईद पाकिस्तानपरस्त एवं भारतविरोधी माने जाते रहे हैं। जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव के बाद मुफ्ती मुहम्मद सईद ने सार्वजनिक रूप से पाकिस्तान को धन्यवाद दिया था। ‘आप की अदालत’ में रजत शर्मा ने एक और बहुत बड़ी गलती की। महबूबा मुफ्ती ने जिस समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मजाक उड़ाया और उनके लिए आपत्तिजनक बातें कहीं, उस पर रजत शर्मा को बहुत कड़ा रुख अपनाना चाहिए था, किन्तु उन्होंने ऐसा नहीं किया। इसी प्रकार जब महबूबा मुफ्ती ने यह कहा कि उनकी पार्टी ने भारतीय जनता पार्टी के साथ सरकार बनाकर गलती की और कश्मीर की जनता की नाराजगी मोल ली तो रजत शर्मा को उनके उस कथन का आधार पूछना चाहिए था। उन्हें यह पूछना चाहिए था कि भारतीय जनता पार्टी में कश्मीर की जनता को क्या बुराई दिखाई दी है? खैर, रजत शर्मा को यह सबक लेना चाहिए और भविष्य में किसी देशद्रोही को अपने कार्यक्रम में बुलाने पर पूरी तैयारी के साथ उसका पूर्णरूपेण भंडाफोड़ भी करना चाहिए।

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