ज़ुबाँ, ज़ायक़ा : ज़ायक़ा ताले और तालीम के शहर का

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सफर पर मुसाफिर निकला तो है पर जाना कहाँ है ठिकाना नहीं... चल पड़ते हैं कदम यूंही किसी राह पर.... रुक जाता है दिल ऐसी ही किसी दुकान पर जहाँ से आती है खुशबू गरमा गर्म कचौड़ी, चीले और चमचम की

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